छोटी धर्म-षिक्षा

The Small Catechism

छोटी धर्म-षिक्षा

मार्टिन लूथर

विषय-सूची

प्रस्तावना

प्राक्कथन

I.      दस आज्ञाएं

II.      विष्वास वचन

III.   प्रभु की प्रार्थना

IV.     बपतिस्मा की पवित्र विधि

V.     पाप स्वीकार

VI.     वेदी की पवित्र-विधि (प्रभु भोज)

प्रतिदिन की प्रार्थनाएं

कर्तव्यों की सूची

प्रस्तावना

हर चर्च, हर पादरी और हर मसीही को (प्रष्नोत्तरी के माध्यम से) धर्म-षिक्षा की जरुरत है। हम जो यीषु मसीह में विष्वास करते हैं, हमें पता होना चाहिये कि हम क्या मानते हैं, और इसे कैसे स्पष्ट करना है। जैसे कि बाइबिल हमें निर्देष देती है,हमें हमेषा जवाब देने के लिये तैयार रहना चाहिये,जो कोई भी उस आषा के बारे में कहता है, जो हम में पाया जाता है (1 पतरस 3:15)। मार्टिन लूथर ने बड़े कुषलता से इस छोटी धर्म-षिक्षा की पुस्तक को लिखा है, ताकि बुनियादी मसीही षिक्षा के ज्ञान व षिक्षण को पासबानों से लेकर छोटे से छोटे बच्चों तक, हर मसीहियों के लिये आगे बढ़ाया जा सके। 

दस आज्ञाएं हमें सिखाती है कि हमें मसीही होने के नाते कैसे जीना चाहिये, और वे हमें हमारी विफलताओं को दिखाते हैं, और हमें हमारे उद्धारकर्ता मसीह की आवष्यकता की ओर इषारा करते हैं। विष्वास-वचन हमें परमेष्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में सीखाता है;हमें विष्वास करना चाहिये कि परमेष्वर ने हमारे लिये क्या किया है और हमारे लिये क्या कर रहा है। प्रभु की प्रार्थना हमें प्रार्थना करना सिखाती है, जैसे कि हमारे प्रभु ने अपने षिष्यों को सिखाया था। बपतिस्मा, पाप स्वीकार, और प्रभु भोज के बारे में धर्म-षिक्षा के कुछ हिस्सों में हमें सिखाया गया है कि ईष्वर अपनी कृपा से हमें कैसे क्षमा करता है। अंत में, लूथर की सुबह और शाम की प्रार्थनाएं, और कर्तव्यों की तालिका, जीवन के विभिन्न पड़ावों के लिये बाइबिल के मार्ग का संकलन है, और आगे बताती है कि कैसे हमें ईष्वर को प्रसन्न करने के तरीके से जीना चाहिये। 

हमें इस धर्म-षिक्षा का उपयोग कैसे करना चाहिये? मार्टिन लूथर भी इसे स्पष्ट रुप से सिखाते हैं। हर परिवार में, घर के मुखिया को अपनी पत्नी, बच्चों और नौकरों को यह सिखाना चाहिये। हर मंडली में, पादरी को लोगों को यह सिखाना चाहिये। और प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर अपना भाग याद रखना चाहिये, दोहराना चाहिये,और परमेष्वर के सम्मुख धर्म-षिक्षा के शब्दों को स्वीकार करना चाहिये। हालांकि छोटी धर्म-षिक्षा के षिक्षण में मूलभूत बातें पायी जाती हैं, तौभी हम खुद को इन जीवनदायक शब्दों के बारे में खुद को याद नहीं दिला सकते हैं। 

अपने दिनों में, जब मार्टिन लूथर ने व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न कलीसियाओं का दौरा किये,तो उसने एक धर्म-षिक्षा की अत्यावष्यकता की खोज की। अपने प्रस्तावना में, उसने इन यात्राओं पर अपनी टिप्पणियों के बारे में लिखाः सामान्य लोग, खासकर गांवों में,व्यावहारिक रुप से मसीही सिद्धांत के बारे में कुंछ भी नहीं जानते हैं, और कई पादरी लगभग पूरी तरह से अयोग्य और सिखाने में असमर्थ है। फिर भी सभी लोग मसीही हैं, बपतिस्मा लिये हैं, पवित्र संस्कार लेते हैं, भले ही वे प्रभु की प्रार्थना, धर्म-षिक्षा या दस आज्ञाओं को नहीं जानते हों। धर्म-षिक्षा के बिना,चर्च निष्चित रुप से दयनीय स्थिति में वापस चला जायेगा। परमेष्वर न करे कि ऐसा हो।  

सच्चाई से और बिना अतिषयोक्ति या संदेह के, मैं यह कह सकता हॅू कि यदि केवल लूथर की छोटी धर्म-षिक्षा का ज्ञान होता और हमारी मंडलियों में, और हमारे घरों में पालन किया जाता, तो हम शायद ही किसी झगड़े, ईर्ष्या या विभाजन का एक भी कारण देख पाते; और हमारा चर्च इस अंधेरी दुनिया में अद्भुम प्रकाष की तरह चमकता तो सभी लोग इसकी गर्मी और चैन के लिये आकर्षित होते। परमेष्वर हममें ऐसे भले कार्य उत्पन्न करे। 

यह मुझे बहुत खुषी देता है, इसलिये, लूथर की छोटी धर्म-षिक्षा के इस संस्करण को प्रकाषित करना सभी मसीहियों और विषेष रुप से मेरे साथी लुथरन विष्वासियों के लाभ के लिये है। मुझे उम्मीद है कि वे इस अनुवाद को विष्वासयोग्य, स्पष्ट, समझने में सरल, और निरंतर उत्थान के स्रोत के रुप में पायेंगे। परमेष्वर की कृपा से,मसीह का प्रकाषन इस वर्तमान युग के अंधेरे से चमक सकता है। आईये हम प्रार्थना करें कि ऐसा हो। 

एडवर्ड आर्थर नौमन

एल.सी.एम.एस थियोलॉजिकल एजुकेटर, साउथ एषिया 

डॉ. मार्टिन लूथर की ओर से प्राक्कथन

सभी विष्वासयोग्य, पवित्र पैरिष पासबानों और प्रचारकों को, मार्टिन लूथर की ओर से हमारे प्रभु यीषु मसीह में कृपा, दया और शांति मिले।

जब मैं अपनी यात्राओं का आयोजन कर रहा था तो मैंने अपमानजनक और दयनीय स्थिति की खोज की, जिसने मुझे इस छोटे और सरल रुप में धर्म-षिक्षा या मसीही सिद्धांत को तैयार करने और प्रकाषित करने का आग्रह किया। हे प्रेमी परमेष्वर, मेरी मदद कर! मैंने यहां कितनी बड़ी विपत्ति देखी है। आम आदमी, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, मसीही सिद्धांत के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और दुर्भाग्य से, कई पादरी षिक्षण में पूरी तरह से असमर्थ और अयोग्य हैं। यह कहना शर्म की बात है। और फिर भी,वे सभी मसीही कहलाते हैं, बपतिस्मा लेते हैं, और हमारे साथ मिलकर पवित्र विधियों के उपयोग का आनन्द लेते हैं, भले ही वे इसका अर्थ नहीं जानते हैं, वे प्रभु की प्रार्थना, प्रेरितों के विष्वास वचन या दस आज्ञाओं को भी नहीं सुन सकते हैं। संक्षेप में, वे विवेकहीन पशु से अलग जीवन नहीं जीते हैं; और अब चुंकि सुसमाचार आ चुका है, तो उन्होंने हर मसीही स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने की कला में महारत हासिल कर लिया है। 

हे बिषपों, आप इतनी शर्मनाक रुप से लोगों की उपेक्षा करने के लिये, उन्हें भटकने की अनुमति देने के लिये, और कभी भी अपने कर्तव्य को पूरा करने में एक क्षण भी न गुजारने के लिये – जिस भार को परमेष्वर ने आपके कंधों पर दिया है, अपने कर्तव्य से परे सभी काम करने के लिये, मसीह से क्या कहोगे? दोष आप लोगों पर लगाया जाना है, और मसीही धर्म के विनाष केवल आप लोगों के कारण है। ऐसा हो कि सारे दूर्भाग्य आप लोगों से दूर भाग जाये – मैं आषा करता हॅू कि आप के साथ कुछ भी बुरा नहीं होता है! क्या यह अषुद्धता और अषिष्टता का उच्चतम रुप नहीं है कि आप केवल एक प्रकार से संस्कार को आज्ञा देते हैं, और अपनी मानवीय परंपराओं पर जोर देते हैं, और फिर उसी समय आप लोगों की परवाह नहीं करते हैं कि वे प्रभु की प्रार्थना,विष्वास वचन, दस आज्ञाएं या परमेष्वर के वचन के अन्य भाग जानते हैं, या नहीं? हाय, तुम पर हाय!

हे मेरे प्रिय भाईयों और महाषयों,मैं ईष्वर की खातिर शपथ खाकर आप सभी से बिनती करता हॅू, आप लोग जो पासबान और प्रचारक हैं, खुद को पूरे हृदय सहित अपने काम पर लगायें, जिन लोगों का भार आप लोगों को सौंपा गया है उनके लिये तरस रखें, और लोगों को खासकर जवानों को धर्म-षिक्षा की बातें समझाने में हमारी मदद करें। और आप में से जो कोई भी बेहतर नहीं कर सकते हैं – यदि आप में से कोई इतना अकुषल हैं कि आपको इन मामलों का बिल्कुल ही ज्ञान नहीं है – तो इन तालिकाओं और रचनाओं को लेने में शर्म न करें, और लोगों को वचन से वचन मिलाकर प्रभावित करें जो इस प्रकार हैंः 

पहले स्थान पर, उपदेषक सबसे पहले दसों आज्ञाएं, प्रभु की प्रार्थना, और विष्वास वचन के विभिन्न रुपों या अनेक असमानताओं से सावधानीपूर्वक बचें। परन्तु एक ऐसा रुप चुनें जिसका वह पालन करता हो, और जिसे वह हर समय, साल-दर-साल उपयोग करता हो। मैं सलाह देता हूं, यद्यपि मैं जानता हॅू कि युवा व सरल लोगों को समरुपता में, तय की गयी पाठ और रचनाओं के माध्यम से सिखाया जाना चाहिये। अन्यथा वे आसानी से भ्रमित हो जाते हैं क्योंकि षिक्षक आज उन्हें एक तरह से पढ़ाते हैं और अगले वर्ष कुछ अन्य तरीके से, जैसे कि वह सुधार करने की कामना करता है, और इस प्रकार षिक्षण में खर्च किये गये सभी प्रयास और श्रम खो जाते हैं। 

हमारे धन्य पितरों ने भी इस बात को अच्छी तरह से समझे थे; क्योंकि उन सभों ने प्रभु की प्रार्थना,विष्वास वचन, और दस आज्ञाओं के एक ही रुप का उपयोग किये थे। इसलिये हमें भी उनके परिश्रम का अनुकरण करना चाहिये और युवा व सरल लोगों को इन भागों को इस तरह से पढ़ाने का दर्द होना चाहिये कि इसमें शब्दों का बदलाव न हो, और इसे ऐसा तय करें कि इस वर्ष जो सिखाया गया है, अगले वर्ष इसे सिखाने में कोई परिवर्तन न हो, क्यों न हम इसे कितनी ही बार सिखायें। 

इसलिये आप जो भी चाहते हैं, उसे चुनें और उसका हमेषा पालन करें। लेकिन जब आप सीखे हुए और बुद्धिमान लोगों की उपस्थिति में उपदेष देते हैं, तो आप अपने कौषल का प्रदर्षन कर सकते हैं, और इन भागों को विविध और जटिल तरीकों से प्रस्तुत कर सकते हैं, और उन्हें उतने ही उत्तम रुप दे सकते हैं जितना आप कर सकते हैं। लेकिन युवा लोगों के साथ एक निष्चित, स्थायी रुप और तरीके से चिपके रहें, और उन्हें सबसे पहले इन भागों को सिखायेंः दस आज्ञाएं, विष्वास वचन, प्रभु की प्रार्थना, और इसी तरह पाठ के अनुसार, शब्द से शब्द मिलाकर, ताकि वे भी आप के पीछे एक ही तरीके से दोहरा सके और अपनी याद में संग्रह कर सके।  

लेकिन जो लोग इसे सीखने के लिये तैयार नहीं हैं, उन्हें बताया जाना चाहिये कि वे मसीह का इन्कार करते हैं और वे मसीही नहीं हैं; और उन्हें किसी भी पवित्र संस्कार में शामिल नहीं किया जाना चाहिये, न बपतिस्मा में प्रायोजक के रुप में स्वीकार किया जाना चाहिये, और न ही उन्हें किसी भी प्रकार के मसीही स्वतंत्रता का उपयोग करने दिया जाना चाहिये, परन्तु उन्हें पोप और उनके कार्यकर्ता,और वास्तव में शैतान के पास वापस भेज देना चाहिये। इससे भी बढ़कर, उनके माता-पिता और कार्यकर्ताओं के द्वारा उन्हें भोजन-जल देने से इन्कार किया जाना चाहिये, और उन्हें यह भी सूचित किया जाना चाहिये कि राजकुमार अपने देष से ऐसे असभ्य लोगों को भगाएगा।  

हालांकि, हम किसी पर विष्वास करने के लिये मजबूर नहीं कर सकते हैं, फिर भी हमें लोगों से आग्रह करना चाहिये कि वे यह जानें कि उनके साथ क्या सही है और क्या गलत है। जो कोई कस्बे में निवास करना चाहता है, उन्हें वहां का कानून और सुरक्षा के बारे में जानकारी रखना और उसे पालन करना जरुरी है, जिसका वह आनन्द उठाना चाहता है; भले ही वह एक विष्वासी हो या गुप्त रुप से एक बदमाष या गुलाम। 

दूसरे स्थान पर, जब उन्होंने पाठ को अच्छी तरह से जान लिया है, तो उसके बाद उन्हें अर्थ भी सिखायें, ताकि वे जान सकें कि इसका क्या अर्थ है, और फिर से इन तालिकाओं या किसी अन्य संक्षिप्त समरुपता की पद्धति चुनें। जो भी आप चाहें और उसी से चिपके रहें, और इसके एक भी शब्द को न बदलें, जैसे कि पाठ के बारे में पहले ही बता दिया गया था; और उसके लिये समय लें। आपको एक ही बार में सभी भागों को सिखाने की जरुरत नहीं है, लेकिन एक के बाद एक। जब वे पहली आज्ञा को अच्छी तरह से सीख ले, तो दूसरा लें, और ऐसे ही आगे बढ़ते जायें; अन्यथा वे अभिभूत हो जायेंगे, और वे किसी भी तरह से इसे अपने स्मरण में रखने में सक्षम नहीं होंगे। 

तीसरे स्थान पर, जब आपने इस छोटी धर्म-षिक्षा को सीखा दिया है, तो बड़ी धर्म-षिक्षा लें, और उन्हें एक समृद्ध व पूर्णं ज्ञान भी दें। यहां प्रत्येक आज्ञा, लेख, बिनती, और इसके विभिन्न कार्यों, उपयोगों, लाभों, खतरों, और चोटों के बारे में अधिकाधिक विस्तार में बताया गया है, जैसे कि इन मामलों के बारे में लिखी गयी कई पुस्तकों में बहुतायत से पाये जाते हैं; और विषेष रुप से जो भी आज्ञा या भाग पर जोर दिया गया है, वह आपके लोगों में सबसे बड़ी उपेक्षा है। उदाहरण के लिये चोरी के विषय में सातवीं आज्ञा, यांत्रिकियों और व्यापारियों के बीच और यहां तक कि किसानों और नौकरों के बीच सख्ती से आग्रह किया जाना चाहिये, इन लोगों के बीच कई तरह की बेईमानी और चोरी प्रबल होता है। इसलिये आप भी बच्चों और आम लोगों के बीच चौथी आज्ञा को अच्छी तरह से आग्रह करें, कि वे शांत और वफादार, आज्ञाकारी और शांतिप्रिय हो सकते हैं, और आपको हमेषा पवित्रषास्त्र से कई उदाहरणों की आपूर्ति करनी चाहिये ताकि यह दिखाया जा सके कि परमेष्वर ने ऐसे लोगों को कैसे दंडित किया है या आषिष दी है।  

विषेष रुप से आपको यहां मजिस्ट्रेट और माता-पिता से अच्छी तरह से शासन करने और अपने बच्चों को स्कूल भेजने का आग्रह करना चाहिये,उन्हें यह दिखाना चाहिये कि ऐसा करना उनका कर्तव्य क्यों है, और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे कितना हानिकारक पाप कर रहे हैं। इस तरह की उपेक्षा के लिये वे परमेष्वर और दुनिया के दोनों राज्यों को उखाड़ फेंकते हैं और नष्ट करते हैं, और परमेष्वर व मनुष्य दोनों के सबसे बुरे दुष्मनों के रुप में कार्य करते हैं। और उन्हें पूर्णं स्पष्ट करना है कि अगर वे बच्चों को पादरियों, प्रचारकों, सचिवों जैसे और कई के लिये प्रषिक्षित नहीं कर रहे हैं तो कितने घातक काम कर रहे हैं, और इसके लिये परमेष्वर उन्हें भयंकर रीति से दंडित करेगा। उनके लिये ऐसे प्रचार की आवष्कयता है। ईमानदारी से, मुझे किसी भी अन्य विषय के बारे में नहीं पता है, जिसका इतना अधिक उपयोग करना है। मजिस्ट्रेट और माता-पिता इस मामले में अकथनीय रुप से पाप कर रहे हैं। शैतान भी इन चीजों की वजह से कुछ क्रूर साजिष रच रहा है। 

अंत में, जब से पोप के अत्याचार को समाप्त कर दिया गया है, लोग अब पवित्र-विधियों में जाने के लिये तैयार नहीं है, और वे इसे बेकार और अनावष्यक के रुप में तिरस्कार करते हैं। यहां फिर से हमें उनसे आग्रह करना चाहिये, लेकिन इस समझ के साथः हमें किसी को विष्वास करने, या पवित्र-विधि में शामिल हाने के लिये बाध्य नहीं करना है, न ही कोई नियम बनाना है, न समय, न इसके लिये स्थान; परन्तु हमें इस तरह से प्रचार करना है कि वे आप ही एक सुत्र में बंधकर, बिना किसी नियम के, स्वयं बिनती करेंगे, और जैसे कि यह था, हम पासबानों को पवित्र-विधि की सेवा के लिये विवष करेगा। ऐसा उन्हें यह बताने से होता हैः जो कोई भी वर्ष में कम से कम चार बार पवित्र-विधि की संस्कार की तलाष या इच्छा नहीं करता है, तो यह डर की बात हो जाता है कि वह पवित्र-विधि का तिरस्कार करता है और वह मसीही नहीं है, वह ठीक उसी गैर-मसीही के समान है जिसने न सुसमाचार सुना है और न ही विष्वास किया है। क्योंकि यीषु मसीह ने ऐसा नहीं कहा है कि ‘‘इसे छोड दो या इसका तिरस्कार करो।’’ परन्तु उसने कहा है कि ‘‘जब कभी पीओ,तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’’ सच्चाई यह है कि वह चाहता है कि यह पालन किया जाये, और न कि पूरी रीति से परित्याग या तिरस्कार किया जाये। वह कहता है, ‘‘यही किया करो’’।  

अब जो कोई भी पवित्र-विधि या संस्कार को बहुत महत्व नहीं देता है, उससे पता चलता है कि उसके जीवन में न कोई पाप है, न कोई देह,न कोई शैतान, न कोई दुनिया, न कोई मौत, न कोई खतरा, और न नरक है; अर्थात् वह ऐसी किसी भी बात पर विष्वास नहीं करता है, यद्यपि ये सभी बातें उसके सिर के ऊपर से जाती है और वह शैतान की दुगुणी संपत्ति है। दूसरी ओर, उसे कोई अनुग्रह, जीवन, स्वर्ग, मसीह, ईष्वर, और न ही कुछ अच्छा चाहिये। क्योंकि यदि उसने मान लिया कि उसके पास इतना कुछ है जो बुरा है; और अब इतना कुछ चाहिये जो अच्छा है तो वह पवित्र-विधि की उपेक्षा नहीं करेगा, जिसके द्वारा ऐसी बुराई का निवारण किया जाता है और बहुतायत से अच्छा दिया जाता है। न ही किसी नियम से उसे पवित्र-विधि के लिये बाध्य करना आवष्यक होगा, बल्कि वह स्वेच्छा से दौड़ में दौड़ने लगेगा, और फिर वह खुद को विवष करते हुए आपसे बीनती करेगा कि आप उन्हें पवित्र-विधि की सेवा प्रदान करें।   

इसलिये, आपको इस मामले में कोई कानून नहीं बनाना चाहिये, जैसा कि पोप करता है। केवल स्पष्ट रुप से लाभ और हानि, आवष्यकता और उपयोग, खतरे और आषिष को ही निर्धारित करें जो पवित्र-विधि से जुड़ी हुई है, और लोग आप ही आपकी विवषता के बिना आपके पास आ जायेंगे। लेकिन अगर वे नहीं आते हैं, तो उन्हें जाने दें और उन्हें बतायें कि ऐसे लोग शैतान के हैं क्योंकि वे अपनी बड़ी आवष्यकता और परमेष्वर के अनुग्रहकारी सहायता को महसूस नहीं करते हैं। लेकिन यदि आप यह आग्रह नहीं करते हैं, या एक कानून बनाते या इससे कोई जहर घोलते हैं, तो यह आपकी गलती होती है कि वे पवित्र-विधि का तिरस्कार करते हैं। यदि आप नींद में हैं और आलसी हैं तो कैसे वे आलसी या कुछ और हो सकते हैं? इसलिये आप लोग जो पासबान और प्रचारक हो, इस पर ध्यान करो। हमारा काम पहले जो पोप के अधीन था, उससे अलग हो चुका है; अब यह ंगंभीर और हितकारी हो चुका है, यह इस जगत में थोड़ा प्रतिफल व आभार प्राप्त करता है। लेकिन यदि हम विष्वासपूर्वक श्रम करें तो मसीह स्वयं हमारा प्रतिफल होगा। इस अंत तक सारे अनुग्रह का दाता परमेष्वर हमारी सहायता करे, और हमारे प्रभु यीषु मसीह के द्वारा उसकी स्तुति व धन्यवाद होता रहे! आमीन!

I. दस आज्ञाएं

The Ten Commandments

कैसे घर के मुखिया को इन आज्ञाओं को अपने परिवार में बहुत ही सरल तरीके से सिखाना चाहिये।

पहली आज्ञा

तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।।

तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना,न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है। तू उनको दंडवत् न करना, और न उनकी उपासना करना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, और सब बातों से बढ़कर उस पर भरोसा रखना चाहिये। 

दूसरी आज्ञा

तू अपने परमेश्वर का नाम व्यर्थ न लेना;क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्थ ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम उसके नाम से शाप, शपथ, जादू-टोन्हा, झूठ, या छल का प्रयोग न करें, लेकिन हर जरुरत के समय, प्रार्थना,स्तुति करें और धन्यवाद दें। 

तीसरी आज्ञा

तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम उपदेष और उसके वचन का तिरस्कार न करें, बल्कि इसे पवित्र मानें, और खुषी-खुषी इसे सुनें और जानें। 

चौथी आज्ञा

तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना,जिस से जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तू बहुत दिन तक रहने पाए।।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने माता-पिता और गुरुओं का तिरस्कार या गुस्सा न करें, बल्कि उन्हें सम्मान दें, उनकी सेवा करें, आज्ञा मानें, और उन्हें प्रेम व उच्च सम्मान से थामें रहें। 

पांचवीं आज्ञा

तू खून न करना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने पड़ोसी को उसके शरीर में चोट या नुकसान न पहुंचायें, बल्कि उसका मित्र बनें, और उसके शरीर और जीवन की सभी जरुरतों और परीक्षाओं में उसकी मदद करें। 

छठी आज्ञा

तू व्यभिचार न करना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने शब्दों और कर्मों में पवित्र और सभ्य जीवन जी सकें; और दम्पति (पति-पत्नी) होने के नाते आपस में प्रेम व सम्मान करें।  

सातवीं आज्ञा

तू चोरी न करना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने पड़ोसी का पैसा या सामान न छीनें, न ही धोखे का सौदा या धोखाधड़ी करें, बल्कि उसके माल ओर व्यापार को बेहतर बनाने और बढ़ाने में उसकी मदद करें और उसके धन की रक्षा करने की पूरी कोषिष करें, और उसकी हालत को बेहतर बनायें। 

आठवीं आज्ञा

तू किसी के विरूद्ध झूठी साक्षी न देना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने पड़ोसी के खिलाफ झूठ,जानबुझकर झूठ न बोलें, न ही उसके साथ विष्वासघात, बदनामी, या निंदा करें, बल्कि उसका बचाव करें, उसके बारे में अच्छा सोचें और बोलें, और सब कुछ अच्छे तरीके से समझें और व्याख्या करें।  

नौंवी आज्ञा

तू किसी के घर का लालच न करना। 

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने पड़ोसी की विरासत या घर को धूर्तता से हड़प न लें, और इसे न्याय और कानूनी अधिकार के ढोंग से खुद के लिये प्राप्त करें, लेकिन उसकी सेवा करें और उसका भाग्य कम न होने का ध्यान रखें। 

दसवीं आज्ञा

तू किसी की स्त्री का लालच करना,और न किसी के दास-दासी, वा बैल गदहे का, न किसी की किसी वस्तु का लालच करना।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः

हमें परमेष्वर का भय मानना और उससे प्रेम करना चाहिये, ताकि हम अपने पड़ोसी की पत्नी, नौकरों, या मवेषियों को उससे दूर न करें;उनका अपहरण न करें और न ही उनसे दूर रहें, और उनसे उनके कर्तव्य की परवाह करने का आग्रह करें। 

परमेष्वर इन आज्ञाओं के बारे में संक्षेप में क्या कहता है?

उत्तरः 

निर्गमन 20:5-6 में वह यों कहता हैः 

क्योंकि मै तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दंड दिया करता हूं, और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करूणा किया करता हूं।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः 

परमेष्वर उन सभों को दंडित करने की चितौनी देता है जो इन आदेषों का उल्लंघन करते हैं और अपराध करते हैं। इसीलिये हमें डरना चाहिये और उसके क्रोध से दूर रहना चाहिये, और इन आज्ञाओं के विपरीत कुछ भी नहीं करना चाहिये। लेकिन वह इन आदेषों को पालन करने वाले सभी लोगों के लिये अनुग्रह और हर प्रकार के आषीष का वायदा करता है। इसलिये हमें भी उससे प्रेम करना चाहिये और भरोसा रखना चाहिये, और उसकी आज्ञाओं के मुताबिक पूरे जोष और लगन से अपने पूरे जीवन को चलाना चाहिये। 

II. विष्वास वचन

The Creed

कैसे घर के मुखिया को इसे अपने परिवार में बहुत ही सरल तरीके से सिखाना चाहिये।

पहला अनुच्छेद

सृष्टि के संबंध में 

मैं विष्वास करता हंॅू परमेष्वर पिता पर,जो आकाष और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता है।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः 

मैं विष्वास करता हॅू कि परमेष्वर ने मुझे और सभी प्राणियों को बनाया है; उसने मुझे मेरी देह और प्राण दी है; उसने मुझे आंख, कान और मेरे सभी अंग दिये हैं; मैं विष्वास करता हॅू कि मुझे सोचने-विचारने की शक्ति और सारी इंद्रियां दी है जिसका अब भी वह भरण-पोषण करता है; और इनके साथ-साथ उसने मुझे कपड़े, जुते, मांस, पेय, घर-गृहस्थी, पत्नी-बच्चे, खेत, पशु, और मेरे सारे जरुरत के सामान दिये हैं। मैं विष्वास करता हॅू कि यह सब उसने बहुतायत से दिया है जिससे मेरी प्रतिदिन की जरुरत के अनुसार इस देह व जीवन की सहायता की जा सके। मैं विष्वास करता हॅू कि वह मुझे हर खतरे से बचाता है, और मेरी रक्षा करता है और मुझे हर बुराई से बचाता है; मैं विष्वास करता हॅू कि यह सब उसके पवित्र, पितृत्व, ईष्वरीय भलाई व करुणा और बिना मेरी योग्यता के दी जाती है; मैं विष्वास करता हॅू कि मुझे ऊंचे स्वर से उसकी प्रषंसा करनी चाहिये, धन्यवाद देना चाहिये, उसकी सेवा व आज्ञापालन करना चाहिये। यह सब निष्चित रुप से सत्य है।   

दूसरा अनुच्छेद

छुटकारा के संबंध में 

मैं विष्वास करता हॅू उसके एकलौते पुत्र और प्रभु यीषु पर जो पवित्रात्मा की सामर्थ से गर्भ में आया, और कुंवारी मरियम से जन्म लिया। उसने पुन्तियुस पीलातुस के षासनकाल में दुःख उठाया। वह क्रुस पर चढ़ाया गया, मर गया, गाड़ा गया, अधोलोक में उतरा, और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठा। वह स्वर्ग पर चढ़ गया और सर्वषक्तिमान पिता के दायीं ओर विराजमान हुआ। वहां से वह जीवतों और मृतकों का न्याय करने को पुनः आनेवाला है।

इसका क्या अर्थ है?

उत्तरः

मैं विष्वास करता हॅू कि यीषु मसीह,सच्चा परमेष्वर है, और वह अनन्तकाल से पिता का पहिलौठा है, और यह भी कि वह सच्चा मनुष्य है जो कुंवारी मरियम से जन्मा है; वह मेरा प्रभु है, जिसने मुझ खोये और दोषी प्राणी को मेरे सारे पापों से, शैतान की शक्ति से और मृत्यु से छुड़ाया और बचाया है; और यह काम उसने न सोने-चांदी से, बल्कि अपने पवित्र व कीमती लहू से,और अपने निर्दोष दुख व मृत्यु से किया है, ताकि मैं पूरी रीति से उसका हो सकूं, और उसके अधीन रहॅू; और अनन्त धार्मिकता, निर्दोषता, और निष्कलंकता में रहकर उसके राज्य में सेवा करुं, ठीक जैसे कि वह मृत्यु में से जी उठा, और अब जीवता है और अनन्तकाल तक राज्य करता है। यह निष्चित रुप से सत्य है।

तीसरा अनुच्छेद

पवित्रीकरण के संबंध में 

मैं विष्वास करता हॅू पवित्रात्मा पर,पवित्र सार्वलौकिक कलीसिया पर, संतों की संगति, पापों की क्षमा,देह के पुनरुत्थान और अनंत जीवन पर। आमीन। 

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः 

मैं मानता हूं कि मैं किसी भी तरह से यीषु मसीह को अपना प्रभु करके विष्वास नहीं कर सकता, और न ही उसके पास आ सकता हॅू या अपने कारण वा बल से उस तक पहुंच सकता हूं;परन्तु यह कि पवित्र आत्मा ने मुझे सुसमाचार के साथ बुलाया है, अपने वरदानों से मुझे प्रकाषमान किया है,मुझे पवित्र किया है और सच्चे विष्वास में रखा है। उसी तरह, वह पृथ्वी पर संपूर्णं मसीही कलीसिया को बुलाता है,इकट्ठा करता है, प्रकाषमान करता है, और पवित्र करता है,और उसको एक सच्चे विष्वास के माध्यम से यीषु मसीह में रखता है। इस मसीही कलीसिया में, वह मेरे और सभी विष्वासियों के प्रत्येक दिन के सभी पापों को क्षमा करता है; और अन्त के दिनों में, वह हमें मृत्यु से जिलायेगा, और मुझे व मसीह के सभी विष्वासियों को अनन्त जीवन देगा। यह निष्चित रुप से सत्य है।   

III. प्रभु की प्रार्थना

The Lord’s Prayer

कैसे घर के मुखिया को इसे अपने परिवार में बहुत ही सरल तरीके से सिखाना चाहिये।

“हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में हैं; 

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः 

परमेष्वर प्रेमपूर्वक हमें इस छोटे से परिचय में आमंत्रित करता है कि वह वास्तव में हमारा सच्चा पिता है, और यह कि हम उसके सच्चे संतान हैं, ताकि हम पूर्णं विष्वास के साथ उस पर और अधिक विष्वास करते हुए उसे नाम को पूकारें,  जैसे कि बच्चे बड़े आत्म-विष्वास से अपने माता-पिता से कुछ मांगते हैं। 

पहली याचना

तेरा नाम पवित्र माना जाए।

इसका क्या अर्थ है?

उत्तरः 

परमेष्वर का नाम निष्चय ही अपने आप में पवित्र है; लेकिन हम इस याचना में प्रार्थना करते हैं कि इसे हमारे बीच में भी पवित्र रखा जाये। 

यह कैसे किया जाता है? 

उत्तरः

जब परमेष्वर के वचन को शुद्ध वह ईमानदारी से सिखाया जाता है, तो हम इसके अनुसार पवित्र जीवन जीते भी हैं, जैसे कि परमेष्वर के संतानों को जीना चाहिये। यह ऐसा ही हो कि परमेष्वर जो स्वर्ग में है, वह हमारी मदद करे। लेकिन जो कोई भी परमेष्वर के वचन को विपरीत सिखाता या विपरीत जीवन जीता है, वह अपने बीच में परमेष्वर के नाम को सांसारिक बना देता है। परन्तु हे स्वर्गीय पिता, ऐसा न होने दे, इसे रोक दे। 

दूसरी याचना

तेरा राज्य आये। 

इसका क्या अर्थ होता है? 

उत्तरः 

परमेष्वर का राज्य आप या बिना प्रार्थना के भी आता है; परन्तु इस याचना में हम प्रार्थना करते हैं कि यह हमारे लिये भी आये। 

यह कैसे आता है? 

उत्तरः 

जब हमारा स्वर्गीय पिता हमें अपनी पवित्र आत्मा देता है, तो उसकी कृपा के बारे में यह कहने के लिये कि हम उसके पवित्र वचन को मानते हैं, और ईष्वरीय जीवन जीते हैं, जो यहां इस समय में और फिर बाद में अनन्तकाल में। 

तीसरी याचना

तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।

इसका क्या अर्थ है? 

उत्तरः 

परमेष्वर की भली व कृपालु इच्छा हमारे प्रार्थना के बिना भी पूरी होती है; परन्तु इस याचना में हम प्रार्थना करते हैं कि यह हमारे बीच में भी पूरी हो। 

यह कैसे पूरा होता है? 

उत्तरः

जब परमेष्वर हर दुष्ट योजना, इच्छा, और प्रयास जैसे कि शैतान की इच्छा,संसार और हमारे शरीर को तोड़ता है जो हमें परमेष्वर के नाम को पवित्र मानने से रोकता है, और उसके राज्य को हमारे पास आने से रोकता है; तो वह हमें बल देता है और विष्वास व वचन में दृढ़ रखता है, जो हमारे जीवन के अन्त तक के लिये होता है। यह उसकी भली व अनुग्रहकारी इच्छा है। 

चौथी याचना

हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।

इसका क्या अर्थ होता है? 

उत्तरः 

परमेष्वर निष्चित तौर पर प्रत्येक को प्रतिदिन की रोटी देता है, जो हमारी प्रार्थना के बिना भी होता है; यहां तक कि वह दूष्ट लोगों को भी देता है। परन्तु हम इस याचना की प्रार्थना करते हैं ताकि हम उसकी आषिषों की पहचान कर सकें और उसी तरह हम धन्यवाद देते हुए अपनी प्रतिदिन की रोटी को प्राप्त करते रहें। 

प्रतिदिन की रोटी से क्या समझते है?

उत्तरः

इसका अर्थ होता है कि वह सब कुछ जो हमारे जीवन की आवष्यकताओं और संरक्षण से संबंधित है, अर्थात् भोजन, जल, कपड़े, जूते, घर, गृहस्थी, खेत, पशु, धन, भली पत्नी, अच्छे संतान, ईमानदार नौकर, ईमानदार और वफादार मजिस्ट्रेट, स्थिर सरकार, अच्छा मौसम, शांति,स्वास्थ्य, अनुषासन,सम्मान, अच्छे दोस्त, वफादार पड़ोसी और इस तरह अन्य चीजें भी। 

पांचवीं याचना

और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।

इसका क्या अर्थ होता है? 

उत्तरः

हम इस याचना में मांगते हैं कि स्वर्ग में हमारे पिता हमारे पापों की जांच-पड़ताल नहीं करेंगे, और उनके कारण हमारी प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करेंगे; क्योंकि हम उन चीजों में से किसी के भी योग्य नहीं है जो हम मांगते हैं,और न ही हम उन्हें अर्जित कर सकते हैं। हालांकि,हम मांगते हैं कि वह अपनी भलाई व अनुग्रह से हमें सारी चीजें देगा; क्योंकि प्रतिदिन हम कई तरह से पाप करते हैं, और वास्तव में हमें दण्ड के सिवा किसी और के हकदार नहीं। इसके बदले में, हमे अपने दिल से क्षमा भी करते हैं,क्यों न दूसरों ने हमारे खिलाफ पाप किया है। हम खुषी से बुराई के बदले भलाई वापस करते हैं। 

छठी याचना

और हमें परीक्षा में न ला,

इसका अर्थ क्या होता है? 

उत्तरः 

परमेष्वर निष्चय ही किसी की परीक्षा नहीं करता है। परन्तु इस याचना में हम प्रार्थना करते हैं कि परमेष्वर हमारी रक्षा करेगा और हमें बचायेगा, ताकि शैतान, संसार और शरीर हमें धोखा न दे, और न ही हमें सच्चे विष्वास से बहकाए और हमें अंधविष्वास, निराषा, अधर्म और अन्य महान अपराधों में फेंक दे। और यह कि विषेष रुप से जब हम इस तरह के प्रलोभनों से पीड़ित होते हैं, तो हम पराजित नहीं हो सकते हैं, लेकिन अंत में उन्हें दूर कर सकते हैं और जीत हासिल कर सकते हैं। 

सातवीं याचना

परन्तु बुराई से बचा। 

इसका क्या अर्थ होता है? 

उत्तरः 

हम इस याचना में एक सारांष के रुप में प्रार्थना करते हैं कि स्वर्ग के हमारे पिता परमेष्वर हमें शरीर और प्राण, भलाई और आदर, के खतरों और बुराईयों से बचायेंगे;जब मृत्यु की घड़ी आयेगी तो वह हमें हमारे जीवन का धन्य अन्त देगा, और वह अपनी अनुग्रहकारी भलाई से हमें आंसुओं की घाटी से अपने साथ स्वर्ग को ले जायेगा। 

क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही है।” 

आमीन।

इसका क्या अर्थ होता है?

उत्तरः 

‘आमीन’ का अर्थ है कि मुझे निष्चित होना चाहिये कि ये याचनाएं हमारे पिता को स्वर्ग में स्वीकार्य है, और उसके द्वारा सुनी गयी है; क्योंकि उसने खुद हमें इस तरह प्रार्थना करने की आज्ञा दी है, और वायदा किया है कि वह हमारी बात सुनेगा। ‘आमीन, आमीन’, जिसका तात्पर्य हैः ‘वास्तव में,निष्चित रुप से, ऐसा हो सकता है।’

IV. बपतिस्मा की पवित्र विधि

The Sacrament of Holy Baptism

कैसे घर के मुखिया को इसे अपने परिवार में बहुत ही सरल तरीके से सिखाना चाहिये।

पहला

बपतिस्मा क्या है? 

उत्तरः 

बपतिस्मा केवल सादा जल नहीं है, लेकिन यह परमेष्वर की आज्ञा और परमेष्वर के वचन की समझ से जुड़ा हुआ जल है।

इसमें परमेष्वर का वचन क्या है? 

उत्तरः

हमारे प्रभु यीषु मसीह ने मत्ती 28: 19 में कहा हैः 

‘‘इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।’’

दूसरा

बपतिस्मा क्या देता या इससे क्या लाभ है?

उत्तरः 

यह पापों की क्षमा और मृत्यु व दूष्ट से बचाव में कार्य करता है, और हर विष्वास करने वालों को अनन्त उद्धार देता है जैसे कि परमेष्वर का वचन और उसकी प्रतिज्ञा घोषित करता है। 

परमेष्वर के वे वचन और प्रतिज्ञाएं क्या-क्या हैं? 

उत्तरः 

हमारे प्रभु यीषु मसीह ने मरकुस 16:16 में कहा हैः 

‘‘जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।’’

तीसरा

जल ऐसे महान कार्य कैसे कर सकता है?

उत्तरः

जल निष्चय ही ऐसा महान कार्य नहीं करता है, परन्तु परमेष्वर का वचन करता है जो जल में और जल के साथ है। और विष्वास जो कि जल में परमेष्वर के वचन से है। क्योंकि परमेष्वर के वचन के बिना जल सादा है और यह बपतिस्मा नहीं है। परन्तु परमेष्वर के वचन के साथ यह बपतिस्मा है, जो कि, जीवन का अनुग्रहकारी जल, और पवित्र आत्मा में धोये जाने के कारण नयी पीढ़ी में बनाया जाना है। जैसे कि पौलुस तीतुस 3:4-7 में कहता हैः 

‘‘पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की कृपा, और मनुष्यों पर उसकी प्रीति प्रगट हुई। तो उस ने हमारा उद्धार कियाः और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार, नए जन्म के स्नान, और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ। जिसे उस ने हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के द्वारा हम पर अधिकाई से उंडेला। जिस से हम उसके अनुग्रह से धर्मी ठहरकर, अनन्त जीवन की आशा के अनुसार वारिस बनें।’’ 

चौथा

जल का बपतिस्मा क्या दर्षाता है?

उत्तरः

यह दर्षाता है कि हमारे भीतर अभी भी पुराने आदम को दैनिक आत्मदमन और पश्चाताप के द्वारा सारे पापों व बुरी लालसाओं सहित डुबना और मरना चाहिये; और फिर नया मनुष्यत्व बाहर आना चाहिये ताकि परमेष्वर के सम्मुख धार्मिकता और पवित्र के साथ जीवन बिताया जा सके। 

यह कहां लिखा है?

रोमियों 6:4 में पौलुस कहता हैः 

‘‘सो उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।’’

V. पाप स्वीकार

Confession

कैसे सामान्य लोगों को बताया जाना चाहिये? 

पाप स्वीकार क्या है? 

उत्तरः 

पाप स्वीकार में दो भाग शामिल हैंः पहला पापों की स्वीकारोक्ति है, और दूसरा सुसमाचार के उपदेषक (या जिससे क्षमा मांगा जा रहा है) से क्षमा हासिल करना है; यह ठीक जैसे कि परमेष्वर के हासिल किया जा रहा है। और निसंदेह दृढ़ विष्वास करना है कि उस क्षमादान के द्वारा स्वर्ग के परमेष्वर के सम्मुख सारे पाप क्षमा कर दिये गये हैं।  

हमें किन पापों को स्वीकार करना चाहिये?

उत्तरः 

परमेष्वर के सम्मुख हमें हमारे हर पापों के लिये क्षमा मांगना चाहिये, यहां तक कि हम जिन पापों के बारे में जानते भी न हों; जैसे कि हम प्रभु की प्रार्थना में मांगते हैं। जिससे क्षमा मांगा जा रहा है, उसके सम्मुख हालांकि हमें केवल उन्हीं पापों की क्षमा मांगना चाहिये जिसके बारे में हम जानते हैं, और जिन्हें हम अपने हृदयों में महसूस करते हैं।

ये क्या-क्या हैं? 

उत्तरः 

यहां प्रत्येक व्यक्ति दस आज्ञाओं के अनुसार अपने जीवन के पड़ाव को देखेंः चाहे आप पिता, माता, पुत्र, पुत्री, स्वामी, गृहिणी, या नौकर हों; चाहे आप अनाज्ञाकारी, अविष्वासयोग्य,या उपेक्षा करने वाले हों; चाहे आपने अपने कर्म या बोली से किसी को ठेस पहुंचाया हो; चाहे आपने चोरी, अवहेलना, बर्बादी या किसी की हानि की हो। 

सामान्य लोगों के लिये पाप स्वीकार का छोटा रुप

आप जिससे क्षमा चाहते हैं, उससे इस प्रकार कहना चाहियेः 

आदरनीय फादर, मैं तुझ से मेरी पाप स्वीकारोक्ति सुनने की बिनती करता हॅू, और तू परमेष्वर की खातिर मुझे क्षमा प्रदान करें। 

आगेः 

मैं एक दीन पापी हॅू, मैं परमेष्वर के सम्मुख मान लेता हॅू कि मैं मेरे सारे पापों का दोषी हूं। खासकर मैं स्वीकार करता हॅू कि मैं एक नौकर (या नौकरानी आदि) हॅू, परन्तु मैं अपने स्वामी की सेवा अविष्वासयोग्यता से करता हूं। मेरे स्वामी ने मुझसे जो कहा उसने मैं ने न करके उसको क्रोधित किया है, और श्राप देने का कारण बनाया हैं। मैंने कई बातों की अवहेलना की है और क्षति पहुंचाई है। मैं अपनी बोली और कर्म में बे-षर्म था, मैं अधीर था, मैंने अपने साथियों के साथ लड़ाई की,मैंने गृहिणी के साथ कुड़कुड़ाया। इन सभी बातों के लिये मैं दुखित हॅू और तेरे अनुग्रह की भीख मांगता हॅू। अब से मैं अच्छा करना चाहता हूं। 

घर का स्वामी या गृहिणी इस प्रकार कह सकते हैंः 

विषेष रुप से मैं आपके सामने स्वीकार करता हॅू कि मैं अपने परिवार – अपनी पत्नी, बच्चें और नौकरों को – परमेष्वर की महिमा के लिये प्रषिक्षित नहीं किया;मैं ने श्राप दिया; मैंने परमेष्वर का नाम व्यर्थ लिया; मैंने अषिष्ट शब्दों और कर्मों द्वारा एक बुरा उदाहरण पेष किया है;मैंने अपने पड़ोसियों का नुकसान पहुंचाया है और कई तरह से क्षति पहॅुचाई है; मैंने गलत बटखरे और तौल का उपयोग किया; जब मैंने अपने पड़ोसियों को सामान बेचा तो उन्हें बरगलाया। 

और हरेक व्यक्ति के पेषे में परमेष्वर की आज्ञाओं के विपरीत जो कुछ भी हुआ, उन्हें स्वीकारनें दें।  

लेकिन अगर किसी को यह महसूस नहीं होता है कि वह इन जैसे पापों से बोझिल है, या वजनदार पाप है,तो उसे इसके बारे में चिंतित नहीं होना चाहिये,या अन्य पापों की खोज करना चाहिये, और ऐसा करके पाप-स्वीकार को एक यातना बना ले, लेकिन एक या दो पापों का उल्लेख करे जो वह जानता हो, जैसे किः मैं विषेष रीति से स्वीकार करता हॅू कि मैंने एक बार परमेष्वर के नाम का दुरुपयोग किया; फिर मैंने अनुचित शब्दों का इस्तेमाल किया। एक बार मैंने इस बात की उपेक्षा की, आदि। इतना ही कहें जिससे आत्मा शांति से रहे। 

फिर क्षमाकर्ता यह कहेः 

परमेष्वर तुझ पर करुणामय हो और तेरे विष्वास को दृढ़ करे। आमीन!   

क्षमाकर्ता उक्त व्यक्ति से पाप स्वीकार करने के लिये भी कहेः 

क्या तुम विष्वास करते हो कि मेरी क्षमा परमेष्वर की क्षमा है? 

उत्तरः

हॉ, फादर

फिर उसे स्वीकार करने वाले विष्वासियों को कहने दें। 

यह तेरे विष्वास के अनुसार हो। और हमारे प्रभु यीषु मसीह की आज्ञा के अनुसार, मैं पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से तेरे पापों को क्षमा करता हॅू, आमीन!

जैसे कि वे लोग जो कि पीड़ित विवेक से दुख उठाते हैं, या फिर परीक्षा या निराषा में है;तो पाप स्वीकार करने वाला यह जान लेगा कि कैसे उन्हें पवित्रषास्त्र के वचनों से सांत्वना दिया जाता है, जिससे उनका विष्वास बढ़ेगा। अभी-अभी हमने पाप-स्वीकार का जो रुप रखा है,वह बचकाना, अषिक्षित व सामान्य लोगों के लिये है। 

VI. दी की पवित्र-विधि (प्रभु भोज)

The Sacrament of the Altar

परिवार के मुखिया होने के नाते अपने घर में इसे सरल तरीके से सिखाना चाहिये। 

वेदी की पवित्र-विधि क्या है? 

वेदी की पवित्र-विधि रोटी और दाखरस के तहत मसीह का सच्चा देह व लहू है। स्वयं यीषु मसीह ने इसे ठहराया है कि हम मसीहीगण इसे खायें और पीयें। 

यह कहां लिखा है? 

उत्तरः 

पवित्र सुसमाचार प्रचारकों (मत्ती 26:26; मरकुस 14:22; लुका 22ः19), और संत पौलुस (1 कुरि. 11:23) ने इस प्रकार लिखा हैः 

यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांगकर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है। जो तुम्हारे लिये हैः मेरे स्मरण के लिये यही किया करो। 

फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ। क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है। जब कभी पीओ,तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो। 

परन्तु इस प्रकार खाने और पीने से क्या लाभ है? 

उत्तरः

यह हमें इन शब्दों से इंगित किया गया हैः ‘तुम्हारे पापों की छुड़ौती के लिये दिया गया, और बहाया गया; अर्थात् यह कि पवित्र-विधि के इन शब्दों से हमें पापों की क्षमा, जीवन और उद्धार दिया गया है। क्योंकि जहां कहीं पापों की क्षमा है, वहां जीवन व उद्धार भी है। 

कैसे इसे दैहिक रुप से खाने और पीने से ऐसे बड़े काम हो सकते हैं?

उत्तरः 

खाना और पीना निष्चित तौर पर इन बातों को पूरा नहीं करती है, परन्तु ये शब्द यहां लिखे हैं, अर्थात् ‘तुम्हारे पापों की छुड़ौती के लिये दिया गया, और तुम्हारे लिये बहाया गया’। ये शब्द, दैहिक रुप से खाने और पीने के साथ,इस पवित्र विधि का केन्द्र व जोड़ हैः जो इन वचनों को मानते हैं, वे पापों की क्षमा की ही बात कहते व व्यक्त करते हैं। 

तो फिर कौन इस संस्कार को ग्रहण कर सकता,या इसके योग्य है?  

इसके लिये उपवास करना और अपने देह को तैयार करना निष्चित तौर पर एक अच्छा प्रषिक्षण है। लेकिन वही वास्तव में योग्य और अच्छी तरह से तैयार है जो इन वचनों में विष्वास रखता हैः ‘तुम्हारे पापों की छुड़ौती के लिये दिया गया, और तुम्हारे लिये बहाया गया’।

लेकिन जो कोई भी इन शब्दों पर विष्वास नहीं करता है, या जो उन पर संदेह करता है, वह अयोग्य और अप्रस्तुत है, क्योंकि ‘तुम्हारे लिये’ शब्द हरेक हृदय को विष्वास करने की मांग करता है। 

प्रतिदिन की प्रार्थनाएं

Daily Prayers

  कैसे घर के मुखिया को इसे अपने परिवार में बहुत ही सरल तरीके से सिखाना चाहिये।

सुबह की प्रार्थना

जब आप सुबह उठते हैं, तो आप खुद को पवित्र क्रुस से आिषषित करें और कहेंः

परमेष्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में। आमीन। 

फिर, घुटने टेककर, या खड़े होकर, विष्वास वचन और प्रभु की प्रार्थना दोहरायें। यदि आप चाहें तो यह अतिरिक्त प्रार्थना भी कर सकते हैंः 

हे मेरे स्वर्गीय पिता, मैं तुझे धन्यवाद देता हॅू क्योंकि तू ने अपने प्रिय पुत्र यीषु मसीह के द्वारा मुझे इस रात्रि हर हानि व खतरों से बचा कर रखा है, और मैं प्रार्थना करता हॅू कि आज का दिन तू मुझे हर पाप व बुराई से बचा ताकि मेरा जीवन व हर कार्य तुझे खुषी दे सके। तेरे ही हाथों में मैं खुद को अर्थात् मेरे देह, प्राण और सब बातों को सौंपता हॅू। तेरा पवित्र दूत मेरे साथ रहे, ताकि किसी भी तरह की बुरी शक्ति मुझ पर प्रबल न हो। आमीन। 

फिर जैसे आपकी भक्ति या मनन आपको सलाह देती है, आप आनन्द पूर्वक, भजन गाते हुए या दस आज्ञाओं को दोहराते हुए अपने काम पर जायें। 

संध्या की प्रार्थना

रात्रि को, जब आप अपने बिस्तर पर जायें, तो आप खुद को पवित्र क्रुस से आषिषित करते हुए यह कहेंः 

परमेष्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से। आमीन। 

फिर घुटने में, या फिर खड़े होकर, प्रभु की प्रार्थना और विष्वास वचन दोहरायें। यदि आप चाहें ताक यह अतिरिक्त छोटी प्रार्थना भी कर सकते हैंः 

हे स्वर्गीय पिता, मैं तुझ को धन्यवाद देता हॅॅ, तु ने मुझे अपने प्रिय पुत्र यीषु के द्वारा अपनी बड़ी दया से आज के दिन बचा कर के रखा;और, मैं प्रार्थना करता हॅू कि तु मेरे सारे गलतियों और पापों को क्षमा कर, और इस रात्रि अपनी दया से मुझे, मेरे देह और मेरा प्राण और सभी चीजों को बचा कर रख। तेरा पवित्र दूत मेरे साथ रहे, ताकि किसी भी तरह की बुरी शक्ति मुझ पर प्रबल न हो। आमीन। 

फिर प्रसन्नतापूर्वक सो जायें। 

कैसे परिवार के मुखिया को अपने परिवार को आषिष मांगने ओर वापस धन्यवाद देने के लिये सिखाना चाहिये!

आषीष मांगना

बच्चे और सेवक हाथ जोड़कर और श्रद्धा के साथ मेज पर जायें और कहेंः 

सभों की आंखें तेरी ओर लगी रहती हैं,और तू उनको आहार समय पर देता है। तू अपनी मुट्ठी खोलकर, सब प्राणियों को आहार से तृप्त करता है। 

टिप्पणीः
‘आहार से तृप्त करने’ का तात्पर्य यह है कि सभी जानवरों को खाने के लिये इतना प्राप्त होता है कि वे इसके कारण आनन्दित होते हैं; परन्तु देखभाल और कंजुसी से ऐसी संतुष्टि में बाधा आती है। 

फिर प्रभु की प्रार्थना करें और उसके बाद यह प्रार्थना करेंः 

हमारे प्रभु परमेष्वर और स्वर्गीय पिता,हमें अपने उन वरदानों से आषिषित कर, जो हम हमारे प्रभु यीषु मसीह के द्वारा तेरे भलाई की मुट्ठी से प्राप्त करते हैं। आमीन। 

बदले में धन्यवाद देना

इसी तरह भोजन के बाद भी श्रद्धा से वे हाथ जोड़कर कहेः

यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है, और उसकी करूणा सदा की है। वह सब प्राणियों को आहार देता है, वह सब पशुओं को भोजन देता है, वह कौवों को खिलाता है, न तो वह घोड़े के बल को चाहता है, और न पुरूष के पैरों से प्रसन्न होता है;यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात् उन से जो उसकी करूणा की आशा लगाए रहते हैं।

फिर प्रभु की प्रार्थना कहें और यह प्रार्थना करेंः 

हमारे प्रभु परमेष्वर और हे हमारे पिता,हम तुझे उन सारी लाभों के लिये धन्यवाद देते हैं जो तु ने हमारे प्रभु यीषु मसीह के द्वारा दिया है, जो जीवता है और युगानुयुग तक राज्य करता है। आमीन।

कर्तव्यों की सूची

विभिन्न पवित्र आदेषों और पदो ंके लिये पवित्रषास्त्र के कुछ अंष जो उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैंः 

बिषपों, पासबानों, और प्रचारकों के लियेः 

सो चाहिए, कि अध्यक्ष निर्दोष, और एक ही पत्नी का पति, संयमी, सुशील, सभ्य, पहुनाई करनेवाला, और सिखाने में निपुण हो। पियक्कड़ या मारपीट करनेवाला न हो; बरन कोमल हो, और न झगड़ालू, और न लोभी हो। अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करता हो, और लड़के-बालों को सारी गम्भीरता से आधीन रखता हो। (जब कोई अपने घर ही का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली क्योंकर करेगा)। फिर यह कि नया चेला न हो, ऐसा न हो, कि अभिमान करके शैतान का सा दंड पाए। और बाहरवालों में भी उसका सुनाम हो ऐसा न हो कि निन्दित होकर शैतान के फंदे में फंस जाए (1 तीमुथियुस 3:2-7)। 

क्योंकि अध्यक्ष को परमेश्वर का भंडारी होने के कारण निर्दोष होना चाहिए; न हठी, न क्रोधी, न पियक्कड़, न मारपीट करनेवाला, और न नीच कमाई का लोभी। पर पहुनाई करनेवाला, भलाई का चाहनेवाला,संयमी, न्यायी, पवित्र और जितेन्द्रिय हो। और विश्वासयोग्य वचन पर जो धर्मोपदेश के अनुसार है, स्थिर रहे; कि खरी शिक्षा से उपदेश दे सके; और विवादियों का मुंह भी बन्द कर सके (तीतुस 1:7-9)। 

श्रोतागण अपने पासबानों से जो पाते हैंः

इसी रीति से प्रभु ने भी ठहराया,कि जो लोग सुसमाचार सुनाते हैं, उन की जीविका सुसमाचार से हो (1 कुरि. 9:14)। 

जो वचन की शिक्षा पाता है, वह सब अच्छी वस्तुओं में सिखानेवाले को भागी करे (गलातियों 6:6)। 

जो प्राचीन अच्छा प्रबन्ध करते हैं,विशेष करके वे जो वचन सुनाने और सिखाने में परिश्रम करते हैं, दो गुने आदर के योग्य समझे जाएं। क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, कि दांवनेवाले बैल का मुंह न बान्धना,क्योंकि मजदूर अपनी मजदूरी का हक्कदार है (1 तीमुथियुस 5:17-18)। 

अपने अगुवों की मानो; और उनके अधीन रहो, क्योंकि वे उन की नाई तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते, जिन्हें लेखा देना पड़ेगा, कि वे यह काम आनन्द से करें, न कि ठंडी सांस ले लेकर, क्योंकि इस दशा में तुम्हें कुछ लाभ नहीं। हमारे लिये प्रार्थना करते रहो, क्योंकि हमें भरोसा है, कि हमारा विवेक शुद्ध है; और हम सब बातों में अच्छी चाल चलना चाहते हैं (इब्रानियों 13:17-18)। 

सिविल गवर्नमेंट के बारे मेंः 

हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के आधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं,वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं। इस से जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का साम्हना करता है,और साम्हना करनेवाले दंड पाएंगे। क्योंकि हाकिम अच्छे काम के नहीं, परन्तु बुरे काम के लिये डर का कारण हैं;सो यदि तू हाकिम से निडर रहना चाहता है, तो अच्छा काम कर और उस की ओर से तेरी सराहना होगी;क्योंकि वह तेरी भलाई के लिये परमेश्वर का सेवक है। परन्तु यदि तू बुराई करे, तो डर; क्योकि वह तलवार व्यर्थ लिये हुए नहीं और परमेश्वर का सेवक है; कि उसके क्रोध के अनुसार बुरे काम करनेवाले को दंड दे (रोमियों 13:1-4)। 

न्यायधीष के अधीन जो होना चाहियेः 

उन्हों ने उस से कहा, कैसर का; तब उस ने, उन से कहा; जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो (मत्ती 22:21)। 

इसलिये आधीन रहना न केवल उस क्रोध से परन्तु डर से अवश्य है, वरन विवेक भी यही गवाही देता है। इसलिये कर भी दो, क्योंकि वे परमश्ेवर के सेवक हैं, और सदा इसी काम में लगे रहते हैं। इसलिये हर एक का हक्क चुकाया करो,जिसे कर चाहिए, उसे कर दो; जिसे महसूल चाहिए, उसे महसूल दो; जिस से डरना चाहिए, उस से डरो; जिस का आदर करना चाहिए उसका आदर करो (रोमियों 13:5-7)।

अब मैं सब से पहिले यह उपदेश देता हूं,कि बिनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएं। राजाओं और सब ऊंचे पदवालों के निमित्त इसलिये कि हम विश्राम और चैन के साथ सारी भक्ति और गम्भीरता से जीवन बिताएं (1 तीमुथियुस 2:1-2)।

पौलुस की ओर से जो परमेश्वर का दास और यीशु मसीह का प्रेरित है, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के विश्वास, और उस सत्य की पहिचान के अनुसार जो भक्ति के अनुसार है। उस अनन्त जीवन की आशा पर, जिस की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने जो झूठ बोल नहीं सकता सनातन से की है।  (तीतुस 3:1-2)। 

प्रभु के लिये मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबन्ध के आधीन में रहो, राजा के इसलिये कि वह सब पर प्रधान है। और हाकिमों के, क्योंकि वे कुकर्मियों को दण्ड देने और सुकर्मियों की प्रशंसा के लिये उसके भेजे हुए हैं। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम भले काम करने से निर्बुद्धि लोगों की अज्ञानता की बातों को बन्द कर दो (1 पतरस 2:13-15)। 

पतियों के लियेः 

वैसे ही हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएं रूक न जाएं (1 पतरस 3:7)। 

हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उन से कठोरता न करो (कुलुस्सियों 3:19)। 

पत्नियों के लियेः 

हे पत्नियों, अपने अपने पति के ऐसे आधीन रहो, जैसे प्रभु के (इफिसियों 5:22)। 

हे पत्नियों, तुम भी अपने पति के आधीन रहो। जैसे सारा इब्राहीम की आज्ञा में रहती और उसे स्वामी कहती थीः सो तुम भी यदि भलाई करो, और किसी प्रकार के भय से भयभीत न हो तो उस की बेंटियां ठहरोगी (1 पतरस 3:1, 6)। 

माता-पिताओं के लियेः

और हे बच्चेवालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन-पोषण करो (इफिसियों 6:4)। 

बच्चों के लियेः 

हे बालकों, प्रभु में अपने माता पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहिली आज्ञा है,जिस के साथ प्रतिज्ञा भी है)। कि तेरा भला हो,और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे (इफिसियों 6:1-3)।

दास-दासियों, गुलामों और मजदूरों के लियेः 

हे दासो, जो लोग शरीर के अनुसार तुम्हारे स्वामी हैं, अपने मन की सीधाई से डरते, और कांपते हुए,जैसे मसीह की, वैसे ही उन की भी आज्ञा मानो। और मनुष्यों को प्रसन्न करनेवालों की नाई दिखाने के लिये सेवा न करो, पर मसीह के दासों की नाई मन से परमेश्वर की इच्छा पर चलो। और उस सेवा को मनुष्यों की नहीं, परन्तु प्रभु की जानकर सुइच्छा से करो। क्योंकि तुम जानते हो, कि जो कोई जैसा अच्छा काम करेगा, चाहे दास हो, चाहे स्वतंत्र; प्रभु से वैसा ही पाएगा (इफिसियों 6:5-8)। 

कुलुस्सियों 3:22-24 भी देखें। 

स्वामी और स्वामिनियों के लियेः 

और हे स्वामियों, तुम भी धमकियां छोड़कर उन के साथ वैसा ही व्यवहार करो, क्योंकि जानते हो, कि उन का और तुम्हारा दोनों का स्वामी स्वर्ग में है, और वह किसी का पक्ष नहीं करता (इफिसियों 6:9)। 

हे स्वामियों, अपने अपने दासों के साथ न्याय और ठीक ठीक व्यवहार करो, यह समझकर कि स्वर्ग में तुम्हारा भी एक स्वामी है (कुलुस्सियों 4:1)। 

सामान्य तौर पर युवकों व युवतियों के लियेः 

हे नवयुवकों, तुम भी प्राचीनों के आधीन रहो, बरन तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिये दीनता से कमर बान्धे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का साम्हना करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है। इसलिये परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए (1 पतरस 5:5-6)। 

विधवाओं के लियेः 

जो सचमुच विधवा है, और उसका कोई नहीं; वह परमेश्वर पर आशा रखती है, और रात दिन बिनती और प्रार्थना में लौलीन रहती है। पर जो भोगविलास में पड़ गई, वह जीते जी मर गई है (1 तीमु. 5:5-6)।

सभी लोगों के लिये सामान्य रीति सेः

आपस के प्रेम को छोड़ और किसी बात में किसी के कर्जदार न हो; क्योंकि जो दूसरे से प्रेम रखता है,उसी ने व्यवस्था पूरी की है। क्योंकि यह कि व्यभिचार न करना, हत्या न करना; चोरी न करना; लालच न करना; और इन को छोड़ और कोई भी आज्ञा हो तो सब का सारांश इस बात में पाया जाता है,कि अपने पड़ोसी से अपने समान प्र्रेम रख (रोमियों 13:8-9)। 

अब मैं सब से पहिले यह उपदेश देता हूं,कि बिनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएं (1 तीमु. 2:1)। 

प्रत्येक पाठों को ठीक से सीखें,

और सभी घरानों को भला होगा।