ऑग्सबर्ग की सहमति

Augsburg Confession

ऑग्सबर्ग की सहमति

विश्वास का अंगीकार, जो वर्ष 1530 में, ऑग्सबर्ग की स्थानीय बैठक में कुछ राजकुमारों और शहरों द्वारा शाही महामहिम चार्ल्स पंचम् को सौंपी गयी थीः

‘‘मैं तेरी चितौनियों की चर्चा राजाओं के साम्हने भी करूंगा, और संकोच न करूंगा।’’ भजन संहिता 119ः46

प्रस्तावना

महामहिम सम्राट चार्ल्स पंचम्

सर्व अजेय सम्राट, कैसर औगुस्तुस, परम दयालु प्रभु!

आपके शाही महामहिम ने तुर्क के खिलाफ कार्रवाई पर विचार करने के लिये ऑग्सबर्ग में साम्राज्य की एक स्थानीय बैठक बुलाई है, जो कि सबसे नृशंस अत्याचारी, अनुवांशिक और मसीही नाम और धर्म के प्राचीन शत्रु हैं। हम कैसे प्रभावी रुप से उस सामर्थी सैनिक ताकतों के क्रोध और हमलों का सामना कर सकते हैं। आपने हमें हमारे पवित्र धर्म और मसीही धर्म के बारे मेें असहमति पर विचार करने के लिये भी बुलाया है। इस तरह, धर्म के मामले में, जबकि हर कोई मौजूद हैं तो आप विभिन्न पक्षों की राय और निर्णय सुन सकते हैं; और हम आपसी परोपकार, उदारता और दयालुता में तर्कों पर विचार और तुलना कर सकते हैं। इस तरह, हर पक्ष को हटाने या सुधारने के बाद, जिसे प्रत्येक पक्ष ने लिखित रुप से गलत अर्थ लगाया है या गलत समझा है, इन मामलों को सुलझाया जा सकता है, और एक सरल सत्य और मसीही समझौते में वापस लाया जा सकता है। इस तरह, भविष्य में हम सभी एक शुद्ध और सच्चीे धर्म को अपना सकते हैं और बनाये रख सकते हैं। और जैसे कि हम सभी मसीह के अधीन हैं और उसी के तहत युद्ध करते हैं, इसलिये हम भी एक मसीही कलीसिया में एकता और समझौते में रह सकते हैं।

इस बैठक में, आपने हमें अधोहस्ताक्षरी निर्वाचकों और राजकुमारों, और अन्य लोगों के साथ बुलाया है, और इसी तरह अन्य निर्वाचकों, राजकुमारों, और अधिकारियों ने उसी वजह से साम्राज्य के आदेश का पालन करते हुए तुरंत ऑग्सबर्ग आये हैं। वास्तव में, हम घमण्ड करना नहीं चाहते हैं, तौभी हम यहां सबसे पहले आने वाले लोगों में से थे।

तदनुसार, ऑग्सबर्ग में यहां बैठक की शुरुआत में, आपकी शाही महामहिम ने निर्वाचकों, राजकुमारों और अन्य अधिकारियों को अन्य बातों के साथ प्रस्ताव दिया कि साम्राज्य के विभिन्न अधिकारीगण, अपने साम्राज्य के फरमान के अनुसार जर्मन और लैटिन में अपनी राय और निर्णय प्रस्तुत करे। इसके बाद हमने आपकी शाही महामहिम को जवाब दिया कि हम इस पर विचार करने के बाद अगले बुधवार को अपने सहमति के अनुच्छेद हमारे पक्ष की ओर से प्रस्तुत करेंगे। इसलिये, धर्म के विषय में महामहिम की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता में रहते हुए, हम यह दिखाने के लिये हमारे प्रचारकों और स्वयं के सहमति को प्रस्तुत करते हैं कि वे हमारी भूमि, साम्राज्य और शहरों में – और हमारे कलीसियायों में पवित्रशास्त्र और परमेश्वर के पवित्र वचन से किस तरह की बातें सीखा रहें हैं।

यदि साम्राज्य के अन्य निर्वाचकगण, राजकुमारगण, और अधिकारीगण साम्राज्य के एक ही आदेश का पालन करते हैं, अर्थात् उसी तरह से लैटिन और जमर्नी में उस लेखन को प्रस्तुत करते हैं, और इन धार्मिक मामलों के बारे में अपनी राय देते हैं, तो हम यहां उल्लेखित राजकुमारों और मित्रों के साथ साम्राज्य के महामहिम, दयालु प्रभु के सामने मैत्रीपूर्णं तरीके से हर बातों पर कलीसिया करने के लिये उपस्थित हैं। हम एक सम्मानजनक तरीके से मिलने के लिये तैयार हैं, ताकि दोनों पक्ष आपस में बिना किसी आक्रामक संघर्ष के असहमति पर कलीसिया कर सके। इस प्रकार, परमेश्वर की सहायता से मतभेद का अंत हो सकता है, और हम एक सच्चीे सुसंगत धर्म को रखने के लिये वापस आ सकते हैं। आखिरकार, हम सभी मसीह के अधीन हैं, और उसी के तहत युद्ध करते हैं, इसलिये हम सभी को एक मसीह को स्वीकार करना चाहिये, जो कि आपकी शाही महामहिम के फैसले के अनुसार है, और परमेश्वर की सच्चीाई के अनुसार सब कुछ करते हैं। इन सब के लिये हम सभी परमेश्वर से निरंतर प्रार्थना करते हैं।

हालांकि, अन्य निर्वाचकगण, राजकुमारगण, और अधिकारीगण भी हैं जो दूसरे पक्ष में हैं, और आपकी शाही महामहिम ने समझदारी से कहा है कि हमें इन धार्मिक मामलों को लेखों की आपसी समझौते और शांतिपूर्णं बातचीत से निपटना चाहिये। अब अगर कोई प्रगति नहीं हुई है, और हम इस कलीसिया के माध्यम से कोई सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं करते हैं, तो कम से कम हम आपको एक स्पष्ट गवाही के साथ छोड़ देंगे कि हम अपने हिस्से के लिये मसीही समागम बनाने के रास्ते में कोई बाधा नहीं डाल रहे हैं, अब तक यह परमेश्वर और एक अच्छे विवेक के साथ संभव है। यदि आप इस मामले को एक निष्पक्ष सुनवाई देते हैं, तो आपके साम्राज्य के महामहिम, और उसके साथ-साथ अन्य निर्वाचकगण, अधिकारीगण और जो ईमानदारी और उत्साह से धर्म से प्रेम रखते हैं; बड़े प्रेम से हमारी अंगीकार को सुनेंगे और समझेंगे।

आपकी शाही महामहिम ने केवल एक बार नहीं, लेकिन 1526 ई. में स्पीयर्स की बैठक सहित अक्सर, निर्वाचकों, राजकुमारों और अन्य अधिकारियों को सूचित किया गया, और आपने अपने शाही निर्देशकों को आज्ञा दी कि इसे लिखित रुप से प्रकाशित किया जाये। लेकिन आपकी शाही महामहिम धर्म के मामले से निपटने के लिये, जो आपके महामहिम के नाम पर रिपोर्ट किये गये थे, कुछ कारणों से अंतिम निर्णय और दृढ़ संकल्प के लिये तैयार नहीं थे। इसके बजाय, आपकी शाही महामहिम एक महापरिषद की बैठक के लिये रोमी धर्म अगुवे के साथ आपकेे कार्यालय को उपयोग करना चाहते थे। एक साल पहले स्पियर्स के आखिरी बैठक में उन्होंने उसी संदेश को अधिकाधिक विस्तार के साथ प्रकाशित किये। वहां आपकी शाही महामहिम ने बोहेमिया और हंगरी के राजा और हमारे मित्र फर्डिनेंड के साथ-साथ साम्राज्य के कमिश्नर और वक्ता के द्वारा अन्य बातों के साथ-साथ यह घोषणा करवाया कि आपकी शाही महामहिम ने साम्राज्य के प्रतिनिधियों, सलाहकारों के सभापतियांे, और रैटिसबॉन की सभा में उपस्थित अन्य साम्राज्य के दूतों के द्वारा एक बैठक बुलाने के बिषय में प्रस्ताव को संज्ञान में लिया है; और यह भी कि आपकी शाही महामहिम ने यह भी निर्णय लिया है कि सभा बुलाना उचित होगा, और यह भी कि आपके साम्राज्य के महामहिम को संदेह नहीं था कि रोमी धर्म अगुवों को एक महापरिषद बुलाने के लिये प्रेरित किया जा सकता है, क्योंकि आपकी शाही महामहिम और रोमी धर्म अगुवों के बीच सुलझाये जाने वाले मामले मसीही सामंजस्य के करीब थे। इसलिये आपकी महामहिम ने स्वयं यह संकेत दिया है कि आप इस सार्वजनिक बैठक को बुलाने के लिये अपने साम्राज्य के महामहिम के साथ मुख्य धर्म अगुवों की सहमति प्राप्त करने का प्रयास करेंगे, जिसे जल्द से जल्द निमंत्रण पत्रों द्वारा प्रचारित किया जायेगा।

इसलिये परिणाम यह हो सकता है कि हमारे और दूसरे पक्ष के बीच धर्म के बारे में असहमति का निपटारा सौहार्दपूर्णं और परोपकारी रुप से न हो, तो ऐसे हालत में हम आपकी शाही महामहिम की उपस्थिति में पूर्णं आज्ञाकारिता के होकर एक सामान्य मुक्त मसीही परिषद में अपने कारण प्रस्तुत करेंगे और बचाव करेंगे। इस तरह की परिषद बुलाने के लिये आपके महामहिम के शासनकाल के दौरान आयोजित हर साम्राज्य के सभाओं में निर्वाचकों, राजकुमारों और अन्य अधिकारियों के साथ सहमति बनी हुई है। इस महापरिषद की सभा के लिये, और उसी समय आपकी शाही महामहिम के लिये, हमने पहले भी सभी औपचारिकताओं और कानूनी प्रक्रिया द्वारा खुद को संबोधित किया और इस महत्वपूर्णं और गंभीर मामले के बारे में अपील की। हम अभी भी आपकी शाही महामहिम और महापरिषद को अपील करते हैं। इस दस्तावेज या किसी अन्य प्रकार से उस अपील को त्यागने के लिये हमारा न कोई इरादा है, और न ही हम कुछ चाहते हैं, जब तक कि हमारे और दूसरे पक्ष के बीच असहमति सौहार्दपूर्णं और चैतन्य रुप से तय नहीं हो जाती, दूर नहीं की जाती, और नवीनतम् सामाज्यिक प्रशस्ति पत्र के अनुसार मसीही तालमेल में नहीं लाई जाती। इसके लिये हम यहाँ पूरी तरह से और सार्वजनिक रुप से गवाही देते हैं।

विश्वास के मुख्य अनुच्छेद

अनुच्छेद एक – परमेश्वर के बिषय में

हमारी कलीसियायों ने सर्वसम्मति से सिखाया है कि दिव्य सार की एकता और तीन व्यक्तियों के विषय में निकिया की परिषद् का निर्णय सत्य है और इसे बिना किसी संदेह के विश्वास किया जाना चाहिये। इसका मतलब यह है कि एक ईश्वरीय सार है जिसको अनन्त, बिना देह के, बिना अंगों के, अनन्त शक्ति के, बुद्धि, भलाई, हर दृश्य और अदृश्य वस्तुओं का कर्त्ता और रखवाला परमेश्वर के नाम से पुकारा जाता है। और तौभी उसमें एक ही सार और सामर्थ के तीन व्यक्तित्व पाये जाते हैं, जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रुप में सहशाश्वत हैं। और हम ‘‘व्यक्ति’’ शब्द का उपयोग करते हैं जैसे कि कलीसिया के पादरी ने उपयोग किये थे, न कि किसी दूसरे हिस्से में किसी गुण को दर्शाने के लिये; परन्तु इसलिये कि उनमें खुद जो गुण पायी जाती है।

हम उन सभी पाखण्डी लेखांे की निंदा करते हैं जो इस लेख के खिलाफ उछाले गये हैं, जैसे कि मेनीकियाई जो दो सिद्धांतों में विश्वास करते थे अर्थात् एक अच्छा और दूसरा बुरा। हम वैलेंटाइनियन, एरियन, यूनामीयन, मोहम्मदियन और उनके जैसे अन्य सिद्धांतवादियों की भी निंदा करते हैं। हम पुरानी और नयी नीतिवादी सेमोसैटीन की भी निंदा करते हैं, जो तर्क देते हैं कि केवल एक व्यक्ति है। वे सूक्ष्मता और विधर्म के साथ सिखाते हैं कि वचन और पवित्र आत्मा अलग-अलग व्यक्तित्व नहीं है, परन्तु ‘‘वचन’’ कहे गये शब्द को और ‘‘आत्मा’’ गति को दर्शाता है।

अनुच्छेद दो – मूल पाप के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि आदम के पतन के बाद से, हर मनुष्य जो स्वाभाविक रुप से गर्भ में आता है, वह पाप अर्थात् परमेश्वर  के भय के बिना, परमेश्वर में विश्वास के बिना और कामवासना के साथ जन्म लेता है और हम सिखाते हैं कि यह रोग, या अधर्म का मूल वास्तव में पाप है, और यहां तक कि यह अभी भी उन लोगों को दोषी ठहराता है और उनके लिये अनन्त मृत्यु लाता है, जो बपतिस्मा और पवित्र आत्मा से नया जन्म नहीं पाये हैं। हम पेलागियाई और अन्य सिद्धांतवादियों की भी निंदा करते हैं जो इस बात से इंकार करते हैं कि मूल चरित्रहीनता पाप है, और मसीह की योग्यता की महिमा और लाभ को यह तर्क देते हुए धँुधला करते हैं कि मनुष्य अपनी ताकत और कारण से परमेश्वर के समक्ष धर्मी ठहर सकता है।

अनुच्छेद तीन – परमेश्वर के पुत्र के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि वचन, अर्थात्, परमेश्वर का पुत्र, उस धन्य कुंवारी मरियम के गर्भ में मानव प्रकृति को ग्रहण किया, जिससे दो प्रकृतिः ईश्वरीय प्रकृति और मानव प्रकृति पायी जाती है; जो अविभाज्य रुप से एक व्यक्ति, एक मसीह, सच्ची परमेश्वर और सच्ची मनुष्य है; और जो कुंवारी मरियम से जन्मा, दुख उठाया, क्रुस पर चढ़ाया गया, मर गया, और गाड़ा गया, ताकि वह पिता से हमारा मेल कर ले, और हमारे लिये एक बलिदान ठहरे, जो न केवल हमारे मूल पापों के लिये, परन्तु मनुष्य के वास्तविक पापों के लिये भी।

वह अधोलोक में भी उतरा, और सचमुच तीसरे दिन फिर जी उठा; वह स्वर्ग में चढ़ा ताकि पिता की दाहिनी ओर बैठे, और सदाकाल तक राज्य करे, और सारे प्राणियों पर प्रभूता करे, और हर विश्वास करने वालों के मन में पवित्र आत्मा भेजकर उनको शुद्ध करे, उन पर राज्य करे, उन्हें सांत्वना दे, उन्हें फिर से जिलाये, और उन्हें बुराई और पाप की सामर्थ से बचाये।

प्रेरितों के विश्वास वचन के अनुसार, वही मसीह फिर से जीवतों और मृतकों का न्याय करने के लिये पुनः आयेगा।

अनुच्छेद चार – धर्मी ठहराये जाने के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ताकत, योग्यता या कर्म के द्वारा परमेश्वर के सन्मुख धर्मी नहीं ठहर सकता है, परन्तु मसीह के द्वारा विश्वास से और बिना किसी दाम के धर्मी ठहराया जाता है, जब वे यह मान लेते हैं कि उन्होंने उसकी दया को पा लिया है और मसीह के द्वारा उनके पाप क्षमा कर दिये गये हैं; और उसने अपनी मृत्यु से हमारे पापों कीे तुष्टि की है। परमेश्वर अपनी दृष्टि में इस विश्वास को धार्मिकता के रुप में लागू करता है। रोमियों की पत्री अध्याय 3 और 4

अनुच्छेद पाँच – सेवकाई के बिषय में

सुसमाचार की शिक्षा और पवित्र विधियों की सेवकाई की स्थापना इसलिये की गयी थी कि इस विश्वास को हासिल किया जा सके। क्योंकि वचन और पवित्र विधियों के द्वारा पवित्र आत्मा के रुप में एक माध्यम दिया गया है, तब और वहां उन सुसमाचार सुनने वालों में विश्वास उत्पन्न करता है जिनसे परमेश्वर से प्रसन्न होता है। परन्तु मसीह की खातिर वे लोग धर्मी ठहराये जाते हैं जो विश्वास करते हैं कि उन्होंने मसीह के अनुग्रह को प्राप्त कर लिया है।

हम एनाबैप्टिष्ट और अन्य मतों की निंदा करते हैं जो सोचते हैं कि किसी मनुष्य पर पवित्र आत्मा बिना किसी वाह्य शब्द के, और उनकी स्वयं की तैयारी व कर्मों के द्वारा आ जाता है।

अनुच्छेद छः – नयी आज्ञाकारिता के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि यह विश्वास अच्छे फल लाने के लिये बाध्य है, और यह कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता में होकर भले कार्य करना जरुरी है, जो उसकी इच्छा है। परन्तु हम यह सिखाते हैं कि हमें उन कार्यों पर इस बात के लिये निर्भर नहीं होना है कि यह हमें परमेश्वर के सन्मुख धर्मी ठहरायेगी। क्योंकि पापों की क्षमा और धर्मी ठहराया जाना दोनों ही विश्वास के द्वारा उचित ठहराया जाता है, जैसे कि मसीह के कथन भी गवाही देती हैः ‘‘इसी रीति से तुम भी, जब उन सब कामों को कर चुको जिस की आज्ञा तुम्हें दी गई थी, तो कहो, हम निकम्मे दास हैं; कि जो हमें करना चाहिए था वही किया है’’ (लूका 17ः10)।

कलीसिया के पादरी भी यही सिखाते हैं, क्योंकि एम्ब्रोस कहते हैं कि परमेश्वर ने इसे ठहराया है, कि जो मसीह पर विश्वास करता है वह उद्धार पाता है, और बिना किसी कर्म के, और बिना दाम के, विश्वास ही से पापों की क्षमा प्राप्त करता है।

अनुच्छेद सात – कलीसिया के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि एक पवित्र कलीसिया हमेशा के लिये बना रहेगा। कलीसिया के संतों की मण्डली है, जहां सुसमाचार को सही ढंग से सिखाया जाता है और संस्कारों की सेवा सही ढंग से की जाती है।

और हम सिखाते हैं कि कलीसिया की सच्ची एकता के लिये यह सुसमाचार के सिद्धांत और संस्कारों की सेवकाई से सहमत होना पर्याप्त है। और यह आवश्यक नहीं है कि मानवीय परम्पराएं, अर्थात् संस्कार या समारोह, जो लोगों के द्वारा स्थापित किये गये हैं, हर जगह एक समान हों। जैसे कि पौलुस प्रेरित कहता है, ‘‘एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा। और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है’ (इफिसियों 4ः5-6)।

अनुच्छेद आठ – कलीसिया क्या है

यद्यपि सही मायने में यह संतों और सच्चे विश्वासियों की मण्डली है, तौभी, इस समय जबकि अनेक पाखण्डी और दुष्ट लोग उनमें मिले हुए हैं, जब दुष्ट लोग पवित्र-विधियों की सेवकाई करते हैं, तब भी उसका उपयोग करना वैध है, जो यीशु मसीह के कहने के अनुसार हैः ‘‘शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं’’ (मत्ती 23ः2)। यीशु की आज्ञा दिये जाने और स्थापित किये जाने के कारण वचन और पवित्र संस्कार दोनों ही प्रभावी है, जब दुष्ट लोग इसकी सेवकाई करते हैं।

हम डोनटिस्ट, और उनके जैसे अन्य लोगों की निंदा करते हैं, जिन्होंने इस बात से इन्कार किया कि कलीसिया में दुष्ट लोगों की सेवकाई का उपयोग वैध था, और जिन्होंने सोचा कि दुष्ट लोगों की सेवकाई लाभरहित और बिना प्रभाव के थे।

अनुच्छेद नौ – बपतिस्मा के बिषय में

हम सिखाते हैं कि उद्धार के लिये बपतिस्मा आवश्यक है, और बपतिस्मा के माध्यम से परमेश्वर का अनुग्रह दिया जाता है। हम यह भी सिखाते हैं कि बच्चों को बपतिस्मा दिया जाना चाहिये, जब उन्हें बपतिस्मा के माध्यम से परमेश्वर के पास लाया जाता है तो वे परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करते हैं।

हम एनाबैपटिष्टवादियों की निंदा करते हैं जो बच्चों की बपतिस्मा का तिरस्कार करते हैं, और कहते हैं कि बच्चे बपतिस्मा के बिना उद्धार पाये हुए हैं।

अनुच्छेद दस – प्रभु भोज के बिषय में

प्रभु भोज के बारे में हम सिखाते हैं कि मसीह का देह और लहू वास्तव में मौजूद होता है, और इसे उन लोगों को वितरित किया जाता है जो प्रभु भोज खाते हैं; इसके सिवा हम किसी और शिक्षा का तिरस्कार करते हैं।

अनुच्छेद ग्यारह – पाप स्वीकार के बिषय में

पाप स्वीकार के बारे में हम सिखाते हैं कि कलीसियायों में निजी क्षमादान को जारी रखा जाना चाहिये, हालांकि पाप स्वीकार में, सभी पापों की गणना करना आवश्यक नहीं है। भजन संहिता के अनुसार, यह असंभव है। ‘‘अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है?’’ भजन संहिता 19ः12।

अनुच्छेद बारह – प्रायश्चित के बिषय में

प्रायश्चित के बारे में हम सिखाते हैं कि जो लोग बपतिस्मा के बाद फिर से पाप में गिर गये हैं, उनके लिये पापों का पुनः क्षमादान है; वे जब भी अपना जीवन परिवर्तन किये हैं। और कलीसिया को उन्हें क्षमादान देना चाहिये जो पश्चाताप के लिये लौट कर आते हैं।

अब, प्रायश्चित में इन दो भागों को शामिल किया गया हैः पहला पश्चाताप है, जो वो आतंक है जो पाप के ज्ञान के द्वारा अंतरात्मा में प्रहार करती है; और दूसरा विश्वास है जो सुसमाचार या पाप क्षमा से जन्मा है। इस विश्वास का मानना है कि मसीह के कारण पापों को क्षमा कर दी गयी है; और यह अंतरात्मा को सांत्वना देती है, और आतंक से मुक्त कर देती है। यह अच्छे कार्यों का पालन करने के लिये बाध्य कर देता है जो पश्चाताप का फल है।

हम एनाबैपटिष्टवादियों की निंदा करते हैं जो कहते हैं कि जो धर्मी ठहराये गये हैं वे पवित्र आत्मा को खो नहीं सकते। हम उनकी भी निंदा करते हैं जो यह तर्क देते हैं कि कुछ लोग इस जीवन में ऐसी सिद्धता की प्राप्ति कर लेते हैं कि वे पाप कर ही    नहीं सकते।

हम नोवातीवादीयों की भी निंदा करते हैं जो उन लोगों को विमुक्त नहीं करते जो बपतिस्मा के बाद गिर गये हैं, क्यों न वे पश्चाताप करके फिर लौट आये हों।

ऐसे लोग भी तिरस्कृत हैं जो यह नहीं सिखाते हैं कि विश्वास ही से पापों से पुनः क्षमा मिलती हैं; परन्तु हमें अपने स्वयं के संतोष के माध्यम से अनुग्रह प्राप्त करने की आज्ञा देते हैं।

अनुच्छेद तेरह – पवित्र-विधियों के उपयोग के बिषय में

पवित्र-विधियों के संस्कार के उपयोग के बारे में हम सिखाते हैं कि इन संस्कारों की स्थापना न केवल लोगों में विश्वास के एक चिन्ह के रुप में स्थापित की गयी है, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के लिये यह चिन्ह और गवाहियों से भी बढ़कर हो। जो इसको उपयोग करते हैं, परमेश्वर ने उन्हें जागृत करने और उनके विश्वास की पुष्टि के लिये इसे स्थापित किया है। इस कारण से हमें संस्कारों का उपयोग इस तरह से करना चाहिये कि विश्वास को जोड़ा जाये, और उन प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया जाये जो इन संस्कारों के माध्यम से पेश किये जाते हैं।

इसलिये हम उन लोगों की निंदा करते हैं जो सिखाते हैं कि बाहरी कर्म के द्वारा ये संस्कार धर्मी ठहराती है, और जो यह नहीं सिखाते हैं कि इन पवित्र संस्कारों के उपयोग में यह मानने के लिये विश्वास की जरुरत होती है कि सारे पाप क्षमा कर दिये गये हैं।

अनुच्छेद चौदह – कलीसियाई सभा-क्रम के बिषय में

कलीसियाई सभा-क्रम पर हम सिखाते हैं कि किसी को भी सार्वजनिक रुप से कलीसिया में न शिक्षा देनी चाहिये, और न ही पवित्र-विधियों की सेवा करनी चाहिये जब तक कि उसे नियमित रुप से बुलाया न जाये।

अनुच्छेद पंद्रह – कलीसियाई सभा की रीतियों के बिषय में

कलीसिया की रीतियों के बारे में हम सिखाते हैं कि हमें उन बातों को देखना चाहिये जो बिना पाप के हैं और जो कलीसिया की अच्छी व्यवस्था और शांति के लिये लाभदायी है, जैसे कि पवित्र दिन, पर्व और इसके जैसे अन्य।

फिर भी, इस तरह की चीजों के बारे में हम सभी लोगों से बिनती करना चाहते हैं कि वे ये मानते हुए अपने विवेक पर बोझ न डाले कि पहले इस प्रकार की रीतियों का पालन करना उद्धार के लिये जरुरी था।

हम यह भी स्वीकार करते हैं कि सभी मानव परंपराएं जिन्हें परमेश्वर के गुण, योग्यता, अनुग्रह, और पापों की तुष्टि के लिये स्थापित किया गया है, सुसमाचार और विश्वास के सिद्धांतों के विरोध में है। इस कारण से, मांस और दिनों जैसी परम्पराएं और शपथ, जो अनुग्रह की प्राप्ति और पापों से शुद्धिकरण के लिये स्थापित के लिये की गयी थी, बेकार और सुसमाचार के विपरीत हैं।

अनुच्छेद सोलह – नागरिक मामलों के बिषय में

नागरिक मामलों के बिषय में हम सिखाते हैं कि समस्त नागरिक अध्यादेश परमेश्वर के भले कार्य हैं, और यह कि मसीहियों को नागरिक कार्यालयों को सम्भालने, न्यायधीशों के रुप में बैठने, साम्राज्य और अन्य मौजूदा कानूनों के द्वारा न्याय करने, दण्ड देने, उचित युद्धों में शामिल होने, सैनिकों के रुप में सेवा करने, कानूनी अनंुबंध करने, संपत्ति रखने, मजिस्टेªट द्वारा जरुरी होने पर शपथ लेने, पत्नी व्याह लेने, और व्याह में देने की अनुमति दी गयी है।

हम एनाबैपटिष्टवादियों की निंदा करते हैं जो मसीहियों के लिये नागरिक कार्याें की मनाही करते हैं। हम उन लोगों की भी निंदा करते हैं जो परमेश्वर  के भय और विश्वास में सुसमाचार प्रचारीय सिद्धता नहीं रखते हैं, लेकिन नागरिक कामों को त्याग करने में पूर्णं सिद्धता रखते हैं; क्योंकि सुसमाचार हृदय की शाश्वत धार्मिकता के बारे में सिखाती है। इस बीच, सुसमाचार किसी परिवार या राज्य का विनाश नहीं करती है, लेकिन बहुत जरुरी है कि उसे ऐसे अध्यादेशों को परमेश्वर का अध्यादेश मानते हुए संरक्षित किया जाये, और यह कि ऐसे अध्यादेशों में मानवीय स्नेह का अभ्यास किया जाये। इसलिये, मसीहियों को अनिवार्य रुप से अपने मजिस्टेªट और कानूनों का पालन करने के लिये बाध्य किया जाता है, सिवाय इसके कि जब उन्हें पाप करने की आज्ञा दी जाती है; क्योंकि उन मामलों में उन्हें मनुष्यों से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिये (प्रेरितों के काम 5ः29)।

अनुच्छेद सतरह – न्याय करने के लिये मसीह के द्वितीय आगमन के बिषय में

हम यह भी सिखाते हैं कि जगत के अन्त में मसीह न्याय के लिये प्रस्तुत होगा, और मरे हुओं को जिलाएगा। वह चुने हुए और भक्तों को अनन्त जीवन और सदा बने रहनेवाला आनन्द प्रदान करेगा, परन्तु वह भक्तिहीनों और दुष्टों को अनन्त प्रताड़ना के लिये दोषी ठहरायेगा।

हम एनाबैपटिष्टवादियों की निंदा करते हैं जो सोचते हैं कि दोषियों और दुष्टों के दण्ड का अन्त होगा।

हम दूसरों की भी निंदा करते हैं जो अब कुछ यहूदी मतों का प्रसार कर रहे हैं, कि मृतकों के पुनरुत्थान से पहले परमेश्वर का भय मानने वाले लोग इस जगत के राज्य को अपने अधिकार में ले लेंगे, और उस समय हर जगह अधर्मी लोगों का दमन किया जायेगा।

अनुच्छेद अठारह – स्वतंत्र इच्छा के बिषय में

स्वतंत्र इच्छा के बिषय में, हम यह सिखाते हैं कि मनुष्य की इच्छा को नागरिक धार्मिकता का चयन करने और उसके कारण चीजों को करने की कुछ स्वतंत्रता है। परन्तु मनुष्य की इच्छा में पवित्र आत्मा के बिना परमेश्वर की धार्मिकता, अर्थात् आत्मिक धार्मिकता के लिये कोई सामर्थ नहीं है। ऐसा इसलिये है क्योंकि ‘‘शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता’’ (1 कुरिन्थियों 2ः14)। बल्कि, हृदय में आध्यात्मिक धार्मिकता उत्पन्न होती है, जब वचन के माध्यम से पवित्र आत्मा प्राप्त किया जाता है।

ऑगस्टीन ने इन बातों को अपने हाइपोग्नोस्टीकन – पुस्तक भाग 3 में इन शब्दों में कहा हैः ‘‘हम मानते हैं कि हर मनुष्य में एक स्वतंत्र इच्छा है। यह निःशुल्क है, जहां तक इसके कारण के न्याय का सवाल है; ऐसा नहीं है कि यह परमेश्वर  के बिना, या तो शुरु करने में सक्षम है, या कम से कम, परमेश्वर  से संबंधित चीजों में कुछ भी पूरा करने के लिये; लेकिन केवल इस जीवन के कार्यों में, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। जो भी काम स्वभाव की अच्छाई से फुटकर निकलती है, मैं ‘अच्छा’ कहता हॅू; जैसे कि खेत में मजदूरी करने की इच्छा होना, खाना-पीना, मित्रों का होना, कपड़े पहनना, घर बनाना, स्त्री व्याह लेना, पशु पालना, विभिन्न उपयोगी कलाओं को सिखना, और जो भी अच्छी बातें इस जीवन से जुड़ी हैं। क्योंकि ये सभी चीजें परमेश्वर के उपाय पर निर्भरता के बिना नहीं है। वास्तव में, ये सब उसी का है और उसके द्वारा ही सब कुछ अस्तित्व में है। मैं ऐसे कार्यों को ‘बुरा’ कहता हॅू जो किसी मूरत की उपासना, हत्या, आदि जैसे कार्य हैं।

हम पैलागिसंस और दूसरों की निंदा करते हैं, जो सिखाते हैं कि पवित्र आत्मा के बिना, अकेले स्वभाव की शक्ति से, हम सब बातों से बढ़कर परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हैं; और यह भी कि हम ‘‘कर्म के तत्व’’ को स्पर्श करने के रुप में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं। यद्यपि स्वभाव किसी तरह बाहरी कार्य करने में सक्षम है (क्योंकि यह चोरी और हत्या से हाथ को रोकने में सक्षम है), तौभी, यह आंतरिक गतियों को उत्पन्न नहीं कर सकता है, जैसे कि परमेश्वर  का भय, परमेश्वर  में विश्वास, पवित्रता, धीरज, इत्यादि।

अनुच्छेद उन्नीस – पाप के कारण के बिषय में

पाप के कारण के बिषय में हम सिखाते हैं कि परमेश्वर प्रकृति का सृजन करता और इसका संरक्षण करता है। हालाँकि पाप के कारण दुष्टों की इच्छा है जो शैतान और अधर्मी लोगों की है। ऐसी इच्छा परमेश्वर की सहायता के बिना स्वयं परमेश्वर से मुड़ जाती है, जैसे कि यीशु ने कहा हैः ‘‘जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है      (यूहन्ना 8ः44)।

अनुच्छेद बीस – पाप के कारण के बिषय में

हमारे शिक्षकों पर अच्छे कामों को मना करने का झूठा आरोप लगाया जाता है। दस आज्ञाओं पर उनके प्रकाशित लेख, और इसी तरह के विषय गवाह है कि उन्होंने जीवन में सभी दशाओं और कर्तव्यों के बारे में अच्छी शिक्षा दी है, और यह भी कि वे कौन से कार्य हैं जो हर बुलाहट में परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं। अब से पहले, प्रचारकों ने शायद ही इन चीजों के बारे में सिखाया था, और लोगों को केवल पवित्र-दिनों, उपवासों, भाईचारे, तीर्थयात्राओं, संतो ंके सम्मान में सेवा, रोजरी, मठवाद और इस प्रकार के अन्य बातोें जैसी बचकाना और व्यर्थ काम के लिये प्रोत्साहित किया गया था। चूंकि हमारे विरोधियों को इन चीजों के बारे में फटकार लगाया गया है, इसलिये वे अब उन्हें हटा रहे हैं, और इन लाभहीन कार्यों का प्रचार नहीं कर रहे हैं जैसे कि उन्हांेने पहले किया था। इसके अलावा, वे विश्वास का उल्लेख करना शुरु कर रहे हैं, जिसके बारे में पहले एक आश्चर्यजनक चुप्पी थी। हमारे विरोधी अब यह सिखाते हैं कि हम केवल कर्म से धर्मी ठहराये नहीं जाते, परन्तु दोनों के जोड़ से, और कहते हैं कि हम विश्वास और कर्म दोनों ही से धर्मी ठहराये जाते हैं। यह सिद्धांत पहले के सिद्धांत से अधिक सहनीय है, और पुराने सिद्धांत की तुलना में अधिक सांत्वनादायक है।

इसलिये क्योंकि विश्वास का सिद्धांत, भले ही यह कलीसिया में प्राथमिक सिद्धांत होना चाहिये, और यह इतने लंबे समय तक अज्ञात रहा – उन सभी को स्वीकार करना होगा कि विश्वास की धार्मिकता के विषय में उनके धर्मोपदेशों में सबसे गहरी चुप्पी थी, और कर्म के सिद्धांत को कलीसिया में व्यवहार किया गया था। हमारे शिक्षकों ने विश्वास के बारे में इस प्रकार से कलीसियाओं में शिक्षा दी हैः

पहला, हमारा कर्म हमें परमेश्वर से मेल नहीं कराता, या न ही इससे पापों की क्षमा, अनुग्रह और धार्मिकता मिलती है; परन्तु ये हमें विश्वास से प्राप्त होता है, जब हम विश्वास करते हैं कि हमने मसीह यीशु की कृपा दृष्टि प्राप्त कर लिया है। केवल वही हमारा मध्यस्थ है और उसी ने परमेश्वर के क्रोध को शांत किया है, (1 तीमुथियुस 2ः5)। ताकि उसके द्वारा हमारा मेल परमेश्वर से हो जाये। इसलिये, जो कोई भी यह विश्वास करता है कि वह कर्म से अनुग्रह प्राप्त करता है, तो वह उसकी कृपा और अनुग्रह को तिरस्कार करता है, क्योंकि वह मसीह के बिना परमेश्वर के पास जाने का मार्ग ढूँढ़ता है, मानवीय बल से, यद्यपि मसीह से स्वयं कहा हैः ‘‘मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं;’’ (यूहन्ना 14ः6)।

पौलुस के द्वारा विश्वास के इस सिद्धांत का उपयोग हर जगह किया गया था। इफिसियों 2ः8 – ‘‘क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर का दान है।’’

और इसलिये कि कोई भी चतुराई से यह नहीं कह सकता है कि हम पौलुस के एक नये अर्थ के साथ आये हैं, इस पूरे मामले को पदरी लोगों की सराहना से समर्थन किया गया है। ऑगस्टीन, कई संस्करणों में, कर्म से कृपा प्राप्त करने खिलाफ अनुग्रह और विश्वास की धार्मिकता का बचाव करता है। और एम्ब्रोस, अपने डी वोकेशन जेंटयम   और दूसरी जगहों पर भी इसी तरह से शिक्षा देते हैं। वह इस प्रकार कहता हैः

‘‘न तो मसीह के लहू के द्वारा छुटकारा का मूल्य थोड़ा कम हो जायेगा, और न ही मनुष्य के कर्मों की श्रेष्ठता को परमेश्वर की दया के द्वारा छीन लिया जायेगा, यदि धर्मी ठहराया जाना, जो कि अनुग्रह से गढ़ा गया है उस कृपा के कारण है जो आगे चल रही है, और जैसे इसे होना चाहिये, एक दाता की ओर से मुफ्त उपहार नहीं, परन्तु मजदूरी का प्रतिफल है।’’

यद्यपि अज्ञानी लोग इस सिद्धांत से घृणा करते हैं, फिर भी, परमेश्वर  का भय मानने वाले और चिंतनशील विवेकी लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि यह इससे बड़ी संात्वना मिलती है। यह इसलिये क्योंकि विवेक को किसी कार्य से नहीं बल्कि विश्वास से शांति मिलती है, ऐसा तब होता है जब वे इस बात को समझ लेते हैं और निश्चय हो जाता है कि उनका परमेश्वर के साथ मेल हो चुका है। जैसे कि पौलुस कहता है, ‘‘ सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें’’ (रोमियों 5ः1)। यह पूरा सिद्धांत घबराये हुए विवेक के उस संघर्ष के ईद-गिर्द घूमता है, और इसे उस संघर्ष से अलग नहीं समझा जा सकता है। इसलिये, अनुभवहीन और धर्मनिरपेक्ष मन वाले लोग इस बारे में गलत हैं, जब वे कल्पना करते हैं कि मसीही धार्मिकता नागरिक और दार्शनिक धार्मिकता के समान है।

पहले विवेक कर्मों के सिद्धांत से ग्रस्त थे और सुसमाचार की सांत्वना को नहीं सुने थे। कुछ लोगों की अंतरात्मा ने उनको रेगिस्तान में और मठों में ले गया, जहां उन्होंने आशा की कि वे एक मठवासी जीवन शैली द्वारा अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं। अन्य लोग पापों की तुष्टिकरण और अनुग्रह हासिल करने के लिये अन्य प्रकार के कार्यों के साथ आये। इस कारण से मसीह में विश्वास के इस सिद्धांत पर कलीसिया करने और इसे नवीनीकृत करने की एक बड़ी आवश्यकता थी, ताकि चिंतित विवेक बिना सांत्वना के न जाएं, बल्कि यह जानें कि वे मसीह पर पूर्णं विश्वास के द्वारा अनुग्रह, पापों की क्षमा और धार्मिकता प्राप्त कर सकते हैं।

हम यह भी चेतावनी देते हैं कि ‘विश्वास’ का अर्थ केवल घटनाओं का ज्ञान नहीं है, जैसे कि ऐसे विश्वास जो दुष्ट लोगों और शैतान रखते हैं। बल्कि यह विश्वास को दर्शाता है जो न केवल इतिहास को मानता है, बल्कि इतिहास के परिणाम को भी, जैसे कि पापों की क्षमा की लेख – जिसका यह कहना है कि हमें मसीह के द्वारा अनुग्रह, धार्मिकता, और पापों की क्षमा मिलती है।

जो कोई भी जानता है कि उसका एक पिता है, जो मसीह के माध्यम से उस पर अनुग्रह करता है, वास्तव में वह परमेश्वर को जानता है। वह जानता है कि परमेश्वर उसकी परवाह करता है, और वह परमेश्वर को पुकारता है। संक्षेप में, वह परमेश्वर के बिना नहीं है, जैसे कि अन्यजाति लोग होते हैं। दुष्टों और अधर्मी लोग पापों की क्षमा के विषय लेख पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। इस कारण से, वे परमेश्वर को अपने दुश्मन के रुप में घृणा करते हैं, वे उसे नहीं पुकारते हैं, और उससे किसी भली वस्तु की चाह नहीं रखते। ऑगस्टीन भी अपने पाठकों को ‘विश्वास’ शब्द के बारे में चितौनी देते हैं, और सिखाते हैं कि पवित्रशास्त्र में पाई जाने वाली ‘विश्वास’ शब्द उस प्रकार का ज्ञान नहीं है जिसे अधर्मी लोग भी रखते हैं, परन्तु यह एक भरोसा है जो किसी आतंकित मन को सांत्वना देता और उत्साहित करता है।

इसके अलावा, हम सिखाते हैं कि अच्छे कर्म करना आवश्यक है, न कि इसलिये कि हम उन पर अनुग्रह प्राप्त करने के लिये भरोसा करें; लेकिन इसलिये कि यह परमेश्वर की इच्छा है। यह केवल विश्वास के द्वारा है कि किसी को पापों की क्षमा मिलती है, और यह बिना दाम के है। और क्योंकि पवित्र आत्मा विश्वास के माध्यम से प्राप्त होता है, इसलिये मन नये हो जाते हैं और नया प्रेम दिया जाता है, जिसके परिणाम में वे भले कर्म के योग्य हो जाते हैं। क्योंकि एम्ब्रोस कहता हैः ‘‘विश्वास भली इच्छा और सही कर्म की जननी है’’।

पवित्र आत्मा के बिना मनुष्य की शक्ति अधर्मी लालसाओं से भरी होती हैं, और वे उन कार्यों को करने के लिये बहुत कमजोर होते हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में भली होती है। इसके अलावा, वे शैतान की सामर्थ के अधीन होते हैं, जो उन्हें तरह-तरह के पापों, अधर्मी विचारों, और खुले अपराधों के लिये मजबूर करता है। हम इन बातों को दार्शनिकों में देख सकते हैं जिन्होंने एक विश्वसनीय जीवन जीने का प्रयास किये, लेकिन सफल नहीं हो पाये, और अनेक खुले अपराधों के साथ खुद को अशुद्ध कर लिये। मनुष्य की कर्तव्यनिष्ठा ऐसी ही होती है जब वे विश्वास के बिना और पवित्र आत्मा के बिना होते हैं, और केवल मानवीय शक्तियों के द्वारा खुद को नियंत्रित करते हैं।

इससे, कोई भी यह देख सकता है कि हमारे सिद्धांत पर भले कर्म को प्रतिबंधित करने का आरोप नहीं लगाया गया है; परन्तु इसके बजाय इसे सराहा जाना चाहिये, क्योंकि यह दिखाता है कि हम कैसे अच्छे काम करने में सक्षम होते हैं। क्योंकि विश्वास के बिना, ऐसा कोई तरीका नहीं है कि मनुष्य अपने स्वभाव से पहली और दूसरी आज्ञाओं का काम कर सकती है। विश्वास के बिना, मानवीय स्वभाव परमेश्वर को नहीं पुकारती है, या परमेश्वर से किसी चीज की अपेक्षा करती है, या अपना क्रूस उठाती है, परन्तु यह मनुष्य की सहायता की चाह रखती और भरोसा करती है। जब परमेश्वर पर विश्वास और भरोसा नहीं होता है, तो हर प्रकार की अभिलाषाएं और मानवीय विचार मनों में हावी हो जाती है। इस कारण से मसीह ने कहा हैः ‘‘तुम मेरे बिना कुछ भी नहीं कर सकते,’’ (यूहन्ना 15ः5)। और कलीसिया यह गीत गाता हैः

तेरी ईश्वरीय कृपा की कमी से,

मनुष्य में कुछ नहीं रह जाता।

उसमें लीन हो जाना हानिरहित है।

अनुच्छेद इक्कीस – संतों की आराधना के बिषय में

संतों की आराधना के बिषय में हम सिखाते हैं कि हम संतों को याद कर सकते हैं ताकि हम अपनी बुलाहट के अनुसार उनके विश्वास और भले कर्मों का अनुशरण कर सकें। उदाहरण के लिये, सम्राट, तुर्कियों को अपने देश से भगाने के लिये दाऊद का अनुशरण कर सकते हैं। हालांकि, पवित्रशास्त्र यह नहीं सिखाती है कि संतों से प्रार्थना करें या उनसे सहायता मांगें। इसके बजाय, यह हमारे समक्ष उस मसीह को स्थापित करता है जो एक बिचवई, महायाजक, और मध्यस्थ है। हमें उसी से प्रार्थना करना चाहिये। वह प्रतिज्ञा करता है कि वह हमारी प्रार्थना सुनेगा, और इस आराधना का अनुमोदन करता है, अर्थात्, यह कि हम निराशा के समय उसके नाम को पुकारें। 1 यूहन्ना 2ः1 – ‘‘और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह’’, आदि।

यह सिर्फ हमारे हर सिद्धांत के बारे में है, जिसमें कोई भी देख सकता है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो पवित्रशास्त्र से, कैथोलिक कलीसिया से, या अपने स्वयं के लेखकों के अनुसार रोम के कलीसिर्या से भिन्न होता है। यदि मामला ऐसा है, तो जो जो लोग हमारे शिक्षकों को विधर्मी कहने पर जोर देते हैं, वे गलत तरीके से निर्णय लेते हैं। तौभी, कुछ अपशब्दों पर असहमति बनी हुई है जो उचित अधिकार के बिना कलीसिया में एक लत के रुप में चढ़ गयी है। और यदि इन उदाहरणों में कुछ भिन्नता थी, तो सहमति की खातिर बिशपों को हमें सहन करते हुए नरमी दिखाना चाहिये, जिसकी हमने समीक्षा कर ली है। कुल मिलाकर, यहां तक कि कॅनान भी इतने गंभीर नहीं है कि हर जगह एक ही अधिकार की मांग करे, और हर कलीसियायों के धार्मिक अधिकार कभी भी एक जैसे नहीं रहे हैं। इसलिये कहा गया है कि हम सावधानीपूर्वक प्राचीन धार्मिक अधिकारों के अधिकांश भागों का ध्यान रखते हैं। इसलिये आरोप है कि हमारे कलीसियायों ने सभी पर्व-त्योहारों को समाप्त कर दिया है, और यह भी कि प्राचीन दिनों में स्थापित की गयी हर बातें झूठी और दुर्भाग्यपूर्णं है। लेकिन यह हमारी आम शिकायत रही है कि आम संस्कारों की कुछ दुरुपयोग थीं। हमें कुछ हद तक इन दुरुपयोगों में सुधार करना होगा, यह देखते हुए कि हम उन्हें एक अच्छे विवेक से अनुमोदित नहीं कर सकते हैं।

वे अनुच्छेद, जिनकी गलतियों की हमने समीक्षा और सुधार की हैः

हमारी कलीसिया विश्वास के किसी भी अनुच्छेद के विषय में कैथोलिक कलीसिया से असहमत नहीं है, परन्तु हमने कुछ गलतियों को को छोड़ दिया है जो नई है, और जिसको कॅनान की मंशा के विपरीत, समयों के भ्रष्टाचार के द्वारा गलत तरीके से स्वीकार किया गया है। इसलिये, यह मामला होने के नाते, हम बिनती करते हैें कि तू शाही महामहिम उन बातों को सुने जो हमने बदला है; और यह भी कि तू उन कारणों को सुने कि क्यों हम उन लोगों को उनके विवेक के खिलाफ उन गलतियों को पालन करने के लिये विवश नहीं करते हैं। आपको उन लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिये जो हमारे पक्ष के खिलाफ लोगों को घृणा को उत्तेजित करने के लिये लोगों के बीच अजीब बदनामी फैला रहे हैं। इस तरह से उन्होंने अच्छे लोगों के मन को विचलित कर दिया और इस भारी विवाद का करण बना, और अब वे उसी तरीकों से, कलह को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी शाही महिम के लिये निस्संदेह यह पता चलेगा कि हमारे सिद्धांत और व्यवहार का रुप इतना असहनीय नहीं है जितना कि इस असभ्य और दुर्भावनापूर्णं लोगों का दावा है। इसके अलावा, आप आम अफवाहों या दुश्मनों के विद्रोह से सच्चाई प्राप्त नहीं कर सकते। लेकिन कोई भी आसानी से परख सकता है कि धार्मिक रीतियों की गरिमा बनाये रखने के लिये, और लोगों में श्रद्धा और पवि़त्र भक्ति को प्रोत्साहित करने के लिये सबसे अच्छा तरीका कलीसिर्याों में धार्मिक रीतियों का सही तरीके से पालन किया जाना जरुरी है।

अनुच्छेद बाईस – दोनों प्रकार की पवित्र विधियों के बिषय में

प्रभु भोज की पवित्र विधि के दोनों तत्वों को साधारण विश्वासियांे को दिया जाता है, क्योंकि इस अभ्यास की आज्ञा मत्ती 26ः27 में हमारे प्रभु के द्वारा दी गयी है, ‘‘फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।’’ यहां यीशु मसीह ने कटोरे के बारे में सब लोगों को पीने की आज्ञा दी गयी है। और यदि कोई धूर्तता से कहता है कि यह पुरोहितों के लिये कहा गया है, तो 1 कुरिन्थियों 11ः27 में पौलुस उदाहरणस्वरुप इसको दोहराता है, जिससे प्रतीत होता है कि पूरी मण्डली दोनों तत्वों में शामिल होती थी। और यह लंबे समय तक कलीसिया में अभ्यास की जाती रही थी, किसी को भी यह पता नहीं है कि कब और किस अधिकार से इसमें बदलाव किया गया था, यद्यपि कूसा के कार्डिनल निकोलस उस समय का उल्लेख करते हैं जब इसे अनुमोदित किया गया था। साइप्रियन कुछ जगहों पर गवाही देता है कि लोगों को लहू दिया गया था। उसी के बारे में जेरोम ने भी गवाही दी है, जो कहता हैः ‘‘पुरोहितगण प्रभु भोज की सेवकाई करते थे, और मसीह का लहू लोगों में वितरित किया जाता था।’’ वास्तव में, पोप गेलैसियस प्रभु भोज को विभाजित नहीं किये जाने की आज्ञा दिये थे ;कपेजण्प्प्ए क्म ब्वदेमबतंजपवदमए बंचण् ब्वउचमतपउनेद्ध  अन्यथा हाल ही के रिवाजों का पालन किया जाता था। जाहिर है, हमें किसी भी ऐसी रिवाज की अनुमति नहीं देना चाहिये जिसे हमारे प्रभु की आज्ञाओं के विरुद्ध परिचय कराया गया हो, जैसे कि कॅनान साक्षी है ;क्पेजण् प्प्प्ण्ए बंचण् टमतपजंजमए ंदक जीम विससवूपदह बींचजमतेद्ध। परन्तु यह रिवाज हमारे पास तक चला आता है, जो न केवल पवित्रशास्त्र के खिलाफ है, बल्कि पुरानी कॅनान और कलीसिया के उदाहरण के खिलाफ भी है। इसलिये, यदि कोई दोनोें प्रकार के संस्कारों का उपयोग करना पसंद करता है, तो उन्हें अपनी विवेक की आवाज के साथ करना चाहिये, अन्यथा उन्हें विवश नहीं करना चाहिये। क्योंकि संस्कार को विभाजित करना मसीह की आज्ञा नहीं होती है, अब हमलोग भी उस भीड़ के साथ चलने से बचने के आदी हो चुके हैं, जिसके पीछे पहले हम चलते थे।

अनुच्छेद तेईस – पुरोहितों के विवाह के बिषय में

उन पुरोहितों के बारे में लगातार शिकायतें आती रही हैं जो शुद्ध नहीं हैं। इस कारण से भी, वे कहते हैं, पोप पायस ने स्वीकार किया है कि, हालांकि ऐसे कारण थे कि क्यों विवाह को पुरोहितों से दूर ले जाया गया था, वहाँ उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात थी कि क्यों इसे वापस दिया जाये ;ेव ठंतजवसवउमव च्संजपदं ूतपजमेद्ध। चुंकि हमारे पुरोहित इन खुले घोटालों से बचना चाहते थे इसलिये उन्होंने व्याह किये, और सिखाये कि उनके लिये वैवाहिक अनुबंध करना व्यवस्था के अनुसार उचित था। पहला, क्यांेकि 1 कुरिन्थियों 7ः2,9 में पौलुस कहता हैः ‘‘परन्तु व्यभिचार के डर से हर एक पुरूष की पत्नी, और हर एक स्त्री का पति हो।’’ और यह भी कि, ‘‘परन्तु यदि वे संयम न कर सकें, तो विवाह करें; क्योंकि विवाह करना कामतुर रहने से भला है।’’ दूसरा, मत्ती 19ः11 में यीशु कहता है, ‘‘सब यह वचन ग्रहण नहीं कर सकते, केवल वे जिन को यह दान दिया गया है।’’ यहां वह सिखाता है कि सभी लोग एकल जीवन जीने के लायक नहीं होते हैं। आखिरकार, उत्पत्ति 1ः28 के अनुसार, परमेश्वर ने मनुष्य को प्रजनन करने के लिये सृजा है, अन्यथा इस सृश्टि को बदलने के लिये मनुष्य के पास परमेश्वर के कार्य और एकल वरदान के सिवा कोई ताकत नहीं है। क्योंकि यह स्पष्ट है, और बहुतों ने यह स्वीकार किया है, कि न कोई भला, ईमानदार, शुद्ध जीवन जीने वाला, और न ही कोई मसीही, विश्वासयोग्य और सही चरित्र वालों के परिणामस्वरुप (अपने प्रयास से) यह हुआ है, परन्तु अधिकांश लोगों ने अपने जीवन के अंत तक एक भयानक, अशांति और अंतरात्मा की पीड़ा महसूस किये हैं। इसलिये जो लोग एकल जीवन के योग्य नहीं हैं, उन्हें विवाह का अनुबंध कर लेना चाहिये। क्योंकि मनुष्य का कोई नियम या अनुबंध परमेश्वर के ठहराये हुए नियम और दी गयी आज्ञा को रद्द नहीं कर सकता है। इसीलिये पुरोहितगण सिखाते हैं कि उनके लिये स्त्री व्याह लेना व्यवस्था के अनुसार उचित है।

यह भी स्पष्ट है कि प्राचीन कलीसिया में पुरोहितगण विवाहित थे। इसलिये 1 तीमुथियुस 3ः2 में पौलुस कहता है कि बिशपों को उन लोगों में से चुना जाना चाहिये जो एक पत्नी का पति हो। और जमर्नी में, चार सौ साल पहले पहली बार, पुरोहितों को हिंसक रुप से एकल जीवन जीने के लिये मजबूर किया गया था। वास्तव में, उन्होंने इसका इतनी शिद्दत से विरोध किया कि मैंज़ के आर्कबिशप जब इस मामले से संबंधित पोप के फरमान को प्रकाशित करने वाले थे, तो वह नाराज पुरोहितों द्वारा उठाये गये दंगे में लगभग मारे जा चुके थे। और इस मामले को इतनी कठोरता के साथ निपटाया गया कि न केवल भविष्य के लिये विवाह वर्जित थी, बल्कि मौजूदा विवाह भी टूट कर अलग-थलग पड़ चुके थे, जो परमेश्वर और मनुष्य के सभी नियमों के विपरीत, जो न केवल पोप बल्कि महासभा के अधिकांश धर्मगुरुओं के द्वारा बनाया गया था। इसके अलावा, अधिकांश परमेश्वर का भय मानने वाले और कलीसिया के उच्च पद पर आसीन बुद्धिजीवी लोगों ने अक्सर आशंका जताए हैं कि इस तरह के ब्रह्मचर्य और विवाह (जिसे स्वयं परमेश्वर ने स्थापित किया है और लोगों के लिये स्वतंत्र कर दिया है) से वंचित लोगों ने कभी भी अच्छे परिणाम नहीं लाये हैं, लेकिन अनेक बड़े और बुरे अपराध   किये हैं।

यह भी देखकर कि मनुष्य का स्वभाव धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है, जैसे कि दुनिया भर में है, जर्मनी में चोरी करने वाले किसी भी अन्य व्यक्ति के खिलाफ रक्षा करना ठीक है।

इससे भी बढ़कर, परमेश्वर ने विवाह को मानवीय दुर्बलता के खिलाफ एक सहायक होने के लिये ठहराया है। कॅनान खुद कहता है कि अब और तब और बाद की उतार-चढ़ाव को मनुष्य की दुर्बलता के कारण आराम देना चाहिये। हम चाहते हैं कि इस मामले में भी ऐसा ही किया जायेगा। हम यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि यदि अब विवाह के लिये मनाही की गयी तो कलीसियायों में कुछ समय के लिये पुरोहितों की कमी हो सकती है।

अब परमेश्वर की आज्ञा लागू है, अब कलीसिया की रीति अच्छी तरह से ज्ञात है, अब अशुद्ध ब्रह्मचर्य अनेक घोटालों, मिलावटों, और अन्य अपराधों का कारण बनता जा रहा है, जो सिर्फ मजिस्टेªट की सजा के हकदार हैं। और फिर भी, आश्चर्यजनक रुप से, पुरोहितों के विवाह के खिलाफ किसी भी अन्य चीज के मुकाबले अधिक क्रूरता का प्रयोग किया जाता है। परमेश्वर ने हमें विवाह का सम्मान करने की आज्ञा दी है। हर सुव्यवस्थित राष्ट्रमंडल नियमों के द्वारा, यहां तक कि अन्यजातियों के बीच, विवाह को सबसे अधिक सम्मानित किया जाता है। लेकिन उन लोगों और पुरोहितों को कॅनान के इरादे के विपरीत, किसी अन्य नहीं बल्कि विवाह के कारण क्रूरता से मार डाला जाता है। 1 तीमुथियुस 4ः3 में, पौलुस इसको शैतान का सिद्धांत कहता है जो विवाह की मनाही करता है। यह अब आसानी से समझा जाता है कि जब वे इस तरह के दंड के साथ विवाह के खिलाफ नियम लागू करते हैं।

हालांकि, मनुष्य का कोई भी कानून परमेश्वर की आज्ञा को रद्द नहीं कर सकता, और इसी तरह न तो कोई शपथ खा सकता है। तदनुसार, साइप्रियन यह भी सलाह देती है कि जो स्त्रियां अपने वायदे के अनुसार खुद को शुद्ध नहीं रख सकती है, उनको विवाह कर लेना चाहिये। उनके शब्द इस प्रकार हैं ;स्मजजमत 4ण्2द्ध ‘‘लेकिन यदि वे अनिच्छुक हैं या धीरज धरने में अयोग्य हैं, तो उनके लिये यही अच्छा है कि वे अपनी अभिलाषा के कारण कामुक होने के बजाय व्याह कर ले; उन्हें निश्चित रुप से अपने भाईयों और बहनों को कोई अपराध नहीं थोपना चाहिये।’’

यहां तक कि कॅनान भी उन लोगों के प्रति कुछ उदारता दिखाती है जिन्होंने उचित उम्र से पहले शपथ खायी है, जैसे कि अब से पहले आम तौर पर होता रहा है।

अनुच्छेद चौबीस – मिस्सा (गिरजा सभा) के बिषय में

हमारे कलीसियायों को मिस्सा को खत्म करने का झूठा आरोप लगाया गया है। वास्तव में, हम मिस्सा को सुरक्षित रखते हैं, और हम इसे सबसे अधिक श्रद्धा के साथ मनाते हैं। हम लगभग सभी सामान्य पर्वों को भी संरक्षित करते हैं, सिवाय इसके जो लैटिन में कुछ जर्मनी भजन मिश्रित किये गये हैं, और इसे लोगों को सिखाने के लिये इसे जोड़ा है। पर्व-त्योहार केवल एक ही कारण से जरुरी हैः अज्ञानी को सिखाने के लिये। और न केवल पौलुस ने आदेश दिया कि हमें कलीसिया में एक ऐसी भाषा का उपयोग करना चाहिये जिसे लोग समझते हैं (1 कुरिन्थियों 14ः2-9), लेकिन इन चीजों को मानवीय विधि के द्वारा इस रीति से स्थापित भी किया गया है। लोग एक साथ पवित्र भोज में शामिल होने के आदी हैं, यदि कोई इसके लिये उपयुक्त हैं; और यह सार्वजनिक आराधना में श्रद्धा और भक्ति को बढ़ावा देता है। जब तक कि पहले लोगों की जांच नहीं की जाती, तब तक किसी को भी प्रवेश नहीं दिया जाता है। लोगों को पवित्र संस्कार के उपयोग और गरीमा की भी सलाह दी जाती है, जिससे निराश विवेकों में बड़ी सांत्वना मिलती है, जिससे वे परमेश्वर पर विश्वास करना सिखते हैं, और परमेश्वर से भली वस्तुओं की प्राप्ति के लिये उम्मीद व प्रार्थना करते हैं। इसी प्रकार, उन्हें संस्कार पर अन्य झूठी शिक्षाओं के बारे में भी निर्देश दिया जाता है। यह उपासना परमेश्वर को प्रसन्न करती है। पवित्र संस्कार का ऐसा उपयोग परमेश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा का पोषण करता है। इसलिये, ऐसा नहीं है कि मिस्सा, हमारे बीच की तुलना में अधिक प्रतिकूल रुप से मनाया जाता है।

स्पष्ट रुप से, हालांकि, और एक लंबे समय से सभी अच्छे लोगों ने सबसे अधिक शिकायत की है और सार्वजनिक रुप से कहा है कि मिस्साओं को पैसे बनाने के लिये निराधार रुप से दुर्व्यवहार किया जा रहा है। सभी गिरजाघरों में यह दुरुपयोग कितना फैला है, किस तरह के लोग कहते हैं कि मिस्सा केवल फीस या वृत्ति के लिये है, और कितने हैं जो कॅनान के विपरीत इसका पालन कर रहे हैं, यह सर्वविदित है। लेकिन पौलुस ने उन लोगों को गंभीर रुप से धमकी दी है, जो प्रभु-भोज के साथ अयोग्यता के साथ बर्ताव करते हैं, जैसे कि वह 1 कुरिन्थियों 11ः27 में कहता हैः ‘‘इसलिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लोहू का अपराधी ठहरेगा।’’

इसलिये, जब हमने अपने पुरोहितों को इस पाप के बारे मेें फटकार लगाया, तो हमारे बीच निजी मिस्सा होना बंद हो गया, क्योंकि शायद ही कोई निजी मिस्सा होती थी जो पैसे के लिये नहीं थी।

बिशपों को इन गलतियों के बारे में भी पता था, और अगर उन्हें समय रहते ठीक कर लिया जाता तो अब असहमति कम होती। पहले, जबकि वे गुप्त रुप से उन बातों को जानते थे जो चल रहा था, तौभी उन्होंने अनेक भ्रष्टाचारों को कलीसिया में फलने-फुलने दिया। अब, जब बहुत देर हो चुकी है, तो वे कलीसिया की परेशानियों की शिकायत करना शुरु करते हैं, जबकि ये गड़बड़ी उन गलतियों से हुई है जो इतने प्रकट थे कि उनका फिर सहन नहीं किया जा सकता था। मिस्सा से संबंधित संस्कार के बिषय में बड़े विघटन हुए हैं। शायद मिस्सा को इतने लंबे समय तक जारी रखने से संसार को दंडित किया जा रहा है, क्योंकि इतने शदियों से कलीसिया के उन लोगों ने इसका सहन किया है, जो इसे सहने और सुधारने दोनों में काबिल थे। क्योंकि निर्गमन 20ः7 में, दस आज्ञाओं में लिखा हैः ‘‘जो यहोवा का नाम व्यर्थ ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।’’ लेकिन ऐसा लगता है कि जब से दुनिया की शुरुआत हुई, गंदे पैसे के लिये, मिस्सा से बढ़कर ऐसा कुछ भी नहीं जिसे परमेश्वर ने कभी ठहराया था।

इसके अलावा, राय लोकप्रिय हो गयी, जो असीम रुप से निजी मिस्साओं में बढ़ोतरी की, जो कि मसीह है, उसने अपनी करुणा से मूल पाप की तुष्टि की, और हमारे लिये मिस्सा की स्थापना की जिससे प्रतिदिन के क्षम्य और नश्वर पापों के लिये बलिदान चढ़ाया जा सके। इससे एक आम राय बन गयी कि बाहरी कार्यों के द्वारा मिस्सा से जीवितों और मृतकों का पाप दूर हो जाता है। तब लोगों को संदेह होने लगा कि क्या कई लोगों के लिये एक मिस्सा किन्ही व्यक्तिगत लोगों के लिये मिस्साओं के बराबर योग्य था, और आगे चलकर इससे मिस्साओं की अनन्त भीड़ लग गयी। इस काम के साथ लोगों ने परमेश्वर  से वह सब कुछ प्राप्त करने की कामना की, जिसकी उन्हें जरुरत थी, और इस बीच मसीह में विश्वास और सच्ची आराधना को भुला दिया गया।

हमारे शिक्षकों ने हमें इन मतों के बारे में चितौनी दी है कि वे पवित्रशास्त्र से भटक गये हैं और मसीह के जुनून को कम कर दिये हैं। क्योंकि मसीह का जुनून केवल एक बलि और तुष्टिकरण था, न केवल मूल अपराधों के कारण, बल्कि अन्य पापों के लिये भी, जैसे कि इब्रानियों 10ः10 में कहा गया हैः ‘‘उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’’ और फिर इब्रानियों 10ः14 में, ‘‘क्योंकि उस ने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।’’ यह कलीसिया में सिखाने के लिये अनसुना नवप्रवर्तन है कि मसीह ने अपनी ही मृत्यु के द्वारा न केवल मूल पापों का तुष्टिकरण किया, बल्कि अन्य पापों का भी। उसी के अनुसार, हम आशा करते हैं कि हर कोई यह समझेगा कि हमारे पास इस त्रुटि की निंदा करने का अच्छा कारण है।

पवित्रशास्त्र यह भी सिखाती है कि हमलोग मसीह पर विश्वास करने से ही परमेश्वर के समक्ष धर्मी ठहरते हैं, जब हम विश्वास करते हैं कि मसीह के बलिदान के द्वारा हमारे पाप क्षमा कर दिये गये हैं। अब, यदि मिस्सा बाहरी कार्य के द्वारा जीवितों और मृतकों का पाप दूर करता है, तो धार्मिकता मिस्साओं के कार्य से आता है, विश्वास से नहीं; जिसकी अनुमति पवित्रशास्त्र नहीं देती है।

परन्तु लूका 22ः19 में, मसीह हमें आज्ञा देता हैः ‘‘मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’’ इसलिये, मिस्सा की स्थापना की गयी थी ताकि जो लोग इस पवित्र-विधि का उपयोग करते हैं, वे विश्वास से ये स्मरण करे कि इससे मसीह के द्वारा क्या लाभ मिलता है, और इससे आतंकित विवेक को सांत्वना व आनन्द मिले। क्योंकि मसीह को स्मरण करने का तात्पर्य उसके लाभों को स्मरण करना है, और उन बातों को महसुस करना है जो वह हमंे देता है। और केवल इतिहास को स्मरण करना ही काफी नहीं है, क्योंकि इसे यहूदी और विधर्मी लोग भी स्मरण कर सकते हैं। इस कारण मिस्सा का उपयोग उस छोर तक किया जाना चाहिये कि प्रभु-भोज की पवित्र-विधि को उन लोगों तक सेवा की जा सके जिन्हें सांत्वना की जरुरत है; जैसे कि एम्ब्रोस कहते हैंः क्योंकि मैं हमेशा पाप करता हॅू, मैं हमेशा दवा लेने के लिये बाध्य हॅू।’’ इसलिये इस संस्कार के लिये विश्वास की जरुरत होती है, और विश्वास के बिना इसका उपयोग व्यर्थ होता है।

अब, चूंकि मिस्सा पवित्र संस्कार है, हम प्रति पवित्र-दिन को एक प्रभु-भोज रखते हैं, और यदि कोई भी व्यक्ति संस्कार की इच्छा रखता है, और अन्य दिनों में भी, तो यह हर मांगने वालों को दिया जाता है। और यह रिवाज कलीसिया में नया नहीं है; क्योंकि ग्रेगोरी से पहले जो पादरी थे, उन्होंने किसी व्यक्तिगत मिस्सा का कोई उल्लेख नहीं किये,  लेकिन वे आम मिस्सा – पवित्र-संगति के बारे में बहुत कुछ कहे थे। क्रिसोस्टॉम का कहना है कि पुरोहित प्रतिदिन वेदी पर खड़ा होता है, और कुछ लोगों को पवित्र-भोज के लिये आगे बुलाता है और कुछ को पीछे छोड़ देता है। और यह प्राचीन कॅनान से प्रतीत होता है कि एक व्यक्ति ने मिस्सा का आयोजन किया, जिससे अन्य सभी प्रिसबितरों और डीकनों ने मसीह के देह को प्राप्त किया; क्योंकि निकियाई कॅनान के शब्द इस प्रकार कहते हैंः ‘‘जितने डीकन हैं, वे अपने क्रम के अनुसार प्रिसबितरों या बिशप से प्रभु भोज प्राप्त करे।’’ और 1 कुरिन्थियों 11ः33 में पौलुस प्रभु भोज के बारे में आज्ञा देता है कि हमें एक दूसरों की प्रतीक्षा करनी चाहिये ताकि एक आम भागीदारी हो सके।

इसलिये, यह देखते हुए कि मिस्सा, जैसे कि हम इसका अभ्यास करते हैं, कलीसिया का उदाहरण है, पवित्रशास्त्र और पादरी से लिया गया है। हमें भरोसा है कि कोई भी इसे अस्वीकार नहीं कर सकता है, खासकर जब से हम सार्वजनिक सभाओं को बनाये रखते हैं, क्योंकि अधिकांश भाग पहले के जैसे ही हैं। केवल मिस्सा की संख्याओं में अन्तर है, जिसका कारण उनमें बड़ी और प्रकट गलतियां हैं, जिसे निःसंदेह कम कर दिया गया है। पुराने जमाने में, यहाँ तक कि सबसे ज्यादा कलीसियायों में, मिस्सा का पालन हर दिन नहीं किया जाता था, जैसे कि हम त्रिपक्षीय इतिहास ;ज्तपचंतजपजम भ्पेजवतलद्ध  पुस्तक 9, अध्याय 38 में पढ़ते हैंः ‘‘फिर अलेक्जेंड्रिया में, हर बुधवार और शुक्रवार को पवित्रशास्त्र पढ़ा जाता था, और डॉक्टर्स उसकी व्याख्या करते थे, यह सभा प्रभु-भोज के बिना होती थी।

अनुच्छेद पच्चीस – पाप-स्वीकार के बिषय में

हमारे बीच कलीसियायों में पाप-स्वीकार खत्म नहीं हुई है। वास्तव में, हमारे प्रभु का देह केवल उन लोगों को देना हमारी सामान्य प्रथा है जिनको पहले जांचा गया है और जो छुटकारा पाये हुए हैं। और हम लोगों को बड़ी सावधानीपूर्वक क्षमादान पर विश्वास के बारे में सिखाते हैं, जिसके बारे में पहले गहन चुप्पी थी। हम अपने लोगों को सिखाते हैं कि उन्हें क्षमा-दान को अत्याधिक प्रतिफल देना चाहिये, क्योंकि यह परमेश्वर की आवाज है, और परमेश्वर की आवाज से उच्चारित होता है। कंुजियों की शक्ति को इसकी सुंदरता के साथ सजाया गया है, और लोगांे को स्मरण दिलाया गया है कि एक बड़ा क्षमा-दान से आंतकित विवेकों को कैसी सांत्वना मिलती है। हम उन्हें यह भी याद दिलाते हैं कि परमेश्वर विश्वास की मांग करता है, यह विश्वास करने के लिये कि इस तरह के क्षमा-दान स्वर्ग से निकलने वाली आवाज है; और यह कि मसीह पर ऐसा विश्वास वास्तव में पापों की क्षमा को प्राप्त करता है। पहले लोगों ने संतोष के लिये बहुत अधिक ध्यान दिया; किसी ने भी विश्वास और मसीह का अनुग्रह और विश्वास की धार्मिकता का उल्लेख नहीं किया। इस कारण से, इस बिंदु पर, हमारे कलीसियायों को दोष दिये जाने का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में, यहां तक कि हमारे विरोधियों को भी स्वीकार करना पड़ता है कि हमारे शिक्षकों ने पश्चाताप के बारे में बहुत परिश्रम से सिखाया और समझाया है।

लेकिन पाप-स्वीकार के विषय में हम सिखाते हैं कि पापों की गणना आवश्यक नहीं है, और यह कि विवेक को अपने सभी पापों की संख्या के लिये चिंता के बोझ से दबाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सभी पापों को याद करना असंभव है। क्योंकि भजन संहिता 19ः12 इस बात की गवाही देता है कि ‘‘अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है?’’ यिर्मयाह 17ः9 भी यही कहता हैः ‘‘मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?’’ लेकिन यदि कोई पाप क्षमा नहीं किया जाता है, तो सिवाय उन पापों के जिसे पुनः गिना गया है। विवेक को कभी शांति नहीं मिलेगी यदि ऐसे कई पाप हो जिसके बारे में वे नहीं जानते या स्मरण नहीं कर सकते। प्राचीन लेखक भी गवाही देते हैं कि यह गणना आवश्यक नहीं है। क्योंकि राजा के आदेश में, क्रिसस्टॉम को हलावा दिया है, जिसने ऐसा कहा हैः ‘‘मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम सार्वजनिक रुप से अपने आप को प्रकट करो, और न ही कि तुम दूसरों के सामने खुद पर आरोप लगाओ, लेकिन मैं आपको उस नबी की बात मानने को कहता हॅू जो कहता हैः ‘‘परमेश्वर के सामने अपनी रीतियों का खुलासा करो।’’ इसलिये परमेश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार करो, जो सच्चा न्यायी है। अपनी गलतियों को बताओ, अपनी जीभ से नहीं, परन्तु अपने विवेक के साथ स्मरण करते हुए।’’ और ग्लोस मानते हैं कि पाप-स्वीकार केवल मनुष्य का अधिकार है, इसकी आज्ञा पवित्रशास्त्र में नहीं दी गयी है, परन्तु कलीसिया के द्वारा ठहराया गया है। फिर भी, क्षमा-दान के महान लाभ के कारण, और क्योंकि यह विवेक के लिये उपयोगी है, और हमारे बीच बरकरार रहे।

अनुच्छेद छब्बीस – अलग-अलग मांस के बिषय में

कलीसिया में सिखाने वाले लोग और सामान्य लोग दोनों ही आम तौर पर यह समझ चुके हैं कि मांस का भेद किया जाना, और इसी तरह मानव निर्मित परम्पराएं, अनुग्रह पाने और पापों की तुष्टिकरण के काबिल है। और यह स्पष्ट है कि दुनिया ने इस तरह से सोचा था कि नये पर्व-त्योहार, नये क्रम, नये पवित्र-दिन, और उपवास के लिये नये अवसर प्रतिदिन ठहराये जाते थे, और कलीसियायों के शिक्षकों ने अनुग्रह पाने के लिये आवश्यक सेवकाई के रुप ठीक ऐसे ही काम किये; और यह कहते हुए लोगों के विवेक को भयंकर रीति से आतंकित किये ताकि वे इन सभी रीतियों का पालन करे। परंपराओं से संबंधित इन बातों ने कलीसिया को बहुत ही नुकसान पहुंचाया है।

सबसे पहले, ये परंपरायें अनुग्रह के सिद्धांत और विश्वास की धार्मिकता को अस्पष्ट करती है, जो कि सुसमाचार का मुख्य भाग है। अनुग्रह का सिद्धांत कलीसिया में सबसे प्रमुख होना चाहिये, ताकि मसीह की कृपा को अच्छी तरह से जानने, और विश्वास को बढ़ावा देने के लिये, कि मसीह पर विश्वास करने ही से पापों की क्षमा हुई है, जो सभी कर्मों से परे है। इसी कारण, पौलुस भी इस लेख पर सबसे अधिक जोर देता है, वह मानवीय परम्पराओं और व्यवस्था को एक तरफ रख देता है, ताकि यह दिखा सके कि मसीही धार्मिकता ऐसे कार्यों से कुछ अलग हैं; अर्थात् यह ऐसा विश्वास है जो मानता है कि मसीह के द्वारा सारे पापों को बिना किसी दाम के क्षमा कर दिया गया है। लेकिन पौलुस के इस सिद्धांत को परम्पराओं द्वारा पूरी रीति से दबा दिया गया है, जिसने एक राय पैदा की है कि हमें मांस और सेवाओं जैसी भेद करने के द्वारा अनुग्रह और धार्मिकता की योग्यता प्राप्त करना चाहिये। पश्चाताप के बारे शिक्षा देने के समय किसी ने भी विश्वास का उल्लेख नहीं किया; उन्होंने केवल संतुष्टि के कार्यों को प्रस्तुत किये, और ऐसा प्रतीत होता था कि संपूर्णं त्याग उनमें समाहित थी।

दूसरा, इन परम्पराओं ने परमेश्वर की आज्ञाओं को अस्पष्ट कर दिया है, क्योंकि परम्पराओं को परमेश्वर की आज्ञाओं से बहुत ऊपर रखा गया है। लोगों ने सोचा कि मसीही धर्म में पूरी तरह से कुछ पवित्र-दिनों, रीतियों, उपवासों और पोशाकों का पालन शामिल है। रीतियों के इन पालनों ने उनके लिये आध्यात्मिक और उत्तम जीवन का खिताब जीता था। प्रत्येक के अपनी बुलाहट के अनुसार परमेश्वर की आज्ञाओं का कोई सम्मान नहीं करते थे, जैसे कि एक पिता को अपने बच्चों को बढ़ाना चाहिये, एक माँ को बच्चे जनने चाहिये, और एक राजकुमार को अपने राष्ट्रमंडल पर शासन करना चाहिये। उन्होंने सोचा कि ये काम सांसारिक और अपूर्णं थे, और उन शानदार पालनों से बहुत नीचे थे। और इस त्रृटि ने धर्मनिष्ठ विवेक को बहुत पीड़ा दी, जिसने दुख दिया कि वे जीवन के एक अपूर्णं दशा में पाये जाते थे, जैसे कि विवाह में, मजिस्टेªट के कार्यालय में, या किसी अन्य नागरिक मंत्रालय में। दूसरी ओर, उन्होंने भिक्षुओं और उनके लोगों की प्रशंसा की, और झूठा अनुमान लगाया कि ऐसे लोगों के द्वारा रीतियों का पालन परमेश्वर को अधिक ग्रहणयोग्य थे।

तीसरा, परम्पराओं ने विवेक के लिये अत्यन्त खतरा ले आया, क्योंकि सभी परम्पराओं का पालन करना असंभव था, और फिर भी लोगों ने इन रीतियों को उपासना के खास कार्य के रुप में न्याय किया। गर्सन लिखते हैं कि बहुत से लोग निराशा में पड़ गये हैं, और कुछ ने अपनी जान भी दे दी, क्योंकि उन्हें लगा कि वे परम्पराओं को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, और ये वे लोग थे जिन्होंने कभी भी अनुग्रह और विश्वास की धार्मिकता से पापों की क्षमा के बारे में नहीं सुने थे। हम देखते हैं कि शीर्ष लोगों और धर्मशास़्ित्रयों ने परम्पराओं को इकट्ठा किये, और विवेक को शांत करने के लिये न्युनीकरण की तलाश किये, और तौभी वे अयोग्य ठहरे हैं, और कभी-कभी उन्होंने विवेक को मरोडे़ भी हैं। और इन परंपराओं को इकट्ठा करने के द्वारा स्कूलों और धर्मोपदेशों पर इतना कब्जा कर लिया गया है कि उनके पास पवित्रशास्त्र को छूने, और अधिक लाभदायी विश्वास के सिद्धांत की तलाश करने, क्रूस, आशा, नागरिक मामलों की गरिमा, और थके विवेक की सांत्वना के लिये समय नहीं है। इसलिये गर्सन और कुछ अन्य धर्मशास़्ित्रयों ने शिकायत की है कि परंपराओं से संबंधित इन प्रयासों ने उन्हें एक बेहतर प्रकार के सिद्धांत पर ध्यान देने से रोक दिया है। ऑगस्टीन ने यह भी मना किया कि लोगों के विवेक इस प्रकार के पालन से बोझिल होना चाहिये, और जैनुरिइयस बड़े बुद्धिमानी से सलाह देते हैं कि उसको पता होना चाहिये कि उनको अलग चीजों के रुप में पालन किया जाना चाहिये, क्योंकि उसके शब्द उसी प्रकार के हैं।

इन कारणों से हमारे शिक्षकों ने इस मामले को उठाया है, न कि बड़बोलेपन से या विशपों के प्रति द्वेषपूर्णं घृणा से, जैसे कि कुछ लोग गलत संदेह करते हैं। कलीसियायों को इन त्रुटियों के लिये बड़ी चितौनी दिये जाने की आवश्यकता थी, जो परंपराओं को गलत समझने से पैदा हुई थी। क्योंकि सुसमाचार विवश करती है कि हम कलीसियायों को अनुग्रह का सिद्धांत और विश्वास की धार्मिकता के लिये दबाव दें। हालांकि लोग इन बातों को नहीं समझ सकते हैं, यदि वे सोचते हैं कि वे अपने विकल्प से रीतियों का पालन करने के द्वारा अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं।

इसलिये, इस तरह हमने सिखाया है कि हम मनुष्य की बनायी रीतियों का पालन करने के द्वारा धार्मिकता या अनुग्रह नहीं पा सकते हैं। और इसलिये हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि इस तरह रीतियों का पालन करना आवश्यक है। अब हम पवित्रशास्त्र की गवाहियों को शामिल करते हैं। मत्ती 15ः3 और 9 में यीशु मसीह उन प्रेरितों का बचाव करते हैं जो पारंपरिक रीतियों का पालन नहीं करते थे (जो कि, हालांकि एक ऐसे मामले के बारे में लगता है जो बिना व्यवस्था के नहीं था, तौभी संवेदनहीन था; जो कि जल से शुद्ध किये जाने के बारे में था), और वह कहता है ‘‘तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो? और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्य की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।’’ इसलिये वह किसी भी निर्रथक उपासना की मांग नहीं करता है। फिर वह कहता हैः ‘‘जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता।’’ रोमियों 14ः17 में पौलुस भी ऐसा ही कहता हैः ‘‘क्योंकि परमश्ेवर का राज्य खाना-पीना नहीं।’’ कुलुस्सियों 2ः16, 20-21 में वह कहता हैः ‘‘इसलिये खाने पीने या पर्ब्ब या नए चान्द, या सब्तों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे।’’ और यह भीः ‘‘जब कि तुम मसीह के साथ संसार की आदि शिक्षा की ओर से मर गए हो, तो फिर उन के समान जो संसार में जीवन बिताते हैं मनुष्यों की आज्ञाओं और शिक्षानुसार और ऐसी विधियों के वश में क्यों रहते हो? कि यह न छूना, उसे न चखना, और उसे हाथ न लगाना।’’ प्रेरितों के काम 15ः10-11 में पतरस कहता हैः ‘‘तो अब तुम क्यों परमेश्वर की परीक्षा करते हो? कि चेलों की गरदन पर ऐसा जूआ रखो, जिसे न हमारे बापदादे उठा सके थे और न हम उठा सकते। हां, हमारा यह तो निश्चय है, कि जिस रीति से वे प्रभु यीशु के अनुग्रह से उद्धार पाएंगे; उसी रीति से हम भी पाएंगे।’’ यहां पतरस अनेक रीति-रीवाजों से अपने विवेक को बोझिल करने से मना करता है, चाहे वो मूसा का हो या फिर किसी अन्य का। और फिर 1 तीमुथियुस 4ः1, 3 में, पौलुस ने मांस के निषेध को शैतानों का सिद्धांत कहा है। क्यों? क्योंकि यह सुसमाचार को स्थापित करने या इस तरह के काम करने के खिलाफ है, ताकि उनके द्वारा हम अनुग्रह पा सकें, या जैसे कि परमेश्वर की सेवकाई के बिना मसीही धर्म अस्तित्व में बनी ही नहीं रह सकती है।

यहाँ हमारे विरोधियों को आपत्ति है कि हमारे शिक्षक जोविनियन की तरह अनुशासन और मांस के प्रति संयम के विरोधी है। लेकिन हम अपने शिक्षकों के लेखन से विपरीत सिखते हैं। क्योंकि उन्होंने हमेशा क्रूस के विषय में यह सिखाया है कि मसीहियों को दुख सहने से लाभ मिलता है। यह सच है कि विश्वसनीय और निष्कपट वैराग्यता, जिसे विभिन्न दुखों के साथ अभ्यास किया जाये, वह मसीह के साथ क्रूसित होना है।

इसके अलावा, हम सिखाते हैं कि प्रत्येक मसीहियों को शारीरिक संयम, व्यायाम या परिश्रम के साथ खुद को प्रशिक्षित और कम करना चाहिये, ताकि न तो तृप्ति और न ही सुस्ती उसको पाप करने के लिये परीक्षा में डाले, और इसलिये नहीं कि हम ऐसे अभ्यासों से अभ्यासों से अनुग्रह की प्राप्ति करें या पापों की तुष्टि करें। और ऐसे वाह्य अनुशासन को हर समय प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, न कि केवल कुछ निर्धारित दिनों के लिये। लूका 21ः34 मंे यीशु मसीह ने आज्ञा दिया हैः ‘‘ऐसा न हो कि तुम्हारे मन खुमार और मतवालेपन, और इस जीवन की चिन्ताओं से सुस्त हो जाएं, और वह दिन तुम पर फन्दे की नाई अचानक आ पड़े।’’ मत्ती 17ः21 में लिखा हैः ये उपवास और प्रार्थना के बिना नही निकलती है।’’ 1 कुरिन्थियों 9ः27 में पौलुस कहता हैः ‘‘परन्तु मैं अपनी देह को मारता कूटता, और वश में लाता हूं।’’ यहाँ वह स्पष्ट रुप से यह दर्शाता है कि वह अपने देह को अपने अधीन रख रहा था, न कि अनुशासन से पापों से क्षमा पाने के लिये, परन्तु इसलिये कि उसका देह उसके अधीन रहते हुए आत्मिक बातों के लिये योग्य ठहरे, और इसलिये कि वह अपनी बुलाहट के अनुसार अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सके। इसलिये, हम उपवास की निंदा नहीं करते हैं, लेकिन उन परम्पराओं को जो कुछ खास दिनों और विवेक के खतरे से मांस का निर्धारण करती है, जैसे कि कर्म आराधना के जरुरी रुप थे।

फिर भी, हमारी ओर से बहुत सारी परंपराएं रखी जाती है, जो कलीसिया में अच्छे क्रम में सहायक होते हैं, जैसे कि मिस्सा में पाठों के क्रम, और मुख्य पवित्र-दिन। परन्तु साथ ही हम लोगों को चितौनी देते हैं कि इस तरह के पालन हमें परमेश्वर के सामने धर्मी नहीं ठहराते हैं, और यह कि इस तरह के मामलांे में पाप न किया जाए, और यदि उसे हटाया जाता है, तो बिना अपराध के हटाया जाना चाहिये। मानव निर्मित संस्कारों में इस तरह की स्वतंत्रता फादरगणों को अच्छी तरह से पता था। क्योंकि पूर्व देश में रोम की तुलना में ईस्टर को एक अलग समय में रखा जाता था, और जब रोम के लोगों ने पूर्वी कलीसिया पर इस विविधता के कारण फूट का आरोप लगाया, तो अन्य लोगों ने सलाह दी कि इस तरह के उपयोग को हर जगह एक समान नहीं किया जाना चाहिये। और इरेनियस कहते हैंः ‘‘उपवास का एक बेसुरापन विश्वास के सद्भाव को नष्ट नहीं करता है।’’ पोप ग्रेगरी भी इसका अनुशरण करते हैं कि इस प्रकार की कलीसिया की एकता को हानि नहीं पहुंचाती है। और त्रिपक्षीय इतिहास ;ज्तपचंतजपजम भ्पेजवतलद्ध पुस्तक 9 में, धर्मनिरपेक्ष संस्कार के कई उदाहरणों का एक संग्रह है, और उसमें इस प्रकार लिखे हैंः ‘‘पवित्र दिनों के बारे में नियमों को लागू करने के लिये प्रेरितोें का मन नहीं था, बल्कि भक्ति और पवित्र जीवन का प्रचार करने, और विश्वास और प्रेम के बारे में सिखाने के लिये था।

अनुच्छेद सताईस – मठवास शपथ के बिषय में

यह समझना आसान होगा कि हम मठवासी शपथ के बारे में क्या सिखाते हैं, अगर हम स्मरण कर सकंे कि मठों को किस अवस्था में रखा गया है, और प्रतिदिन उन्हीं मठांे में कितनी चीजें की गयी हैं, जो कॅनान के विपरीत है। ऑगस्टीन के समय में वे स्वतंत्र संघ थे। बाद में, जब अनुशासन भ्रष्ट हो चुका था, तो अनुशासन को बहाल करने के उद्देश्य से हर जगह शपथ को जोड़ा गया था, जैसे कि सावधानीपूर्वक नियोजित जेल में किया जाता था।

धीरे-धीरे, शपथों के अलावा कई अन्य रीति-रीवाजों का पालन जोड़ दिया गया था, और कईयों ने कानूनन उम्र से पहले इन बेड़ियों को प्राप्त किये, जो कॅनान के विपरीत थे।

कई लोग इस तरह के जीवन में अज्ञानता के कारण भी गये, क्योंकि उन्होंने अपनी खुद की ताकत को गलत समझा, यद्यपि वे लोग काफी पुराने थे। इस तरह वे फंस गये, और बने रहने के लिये मजबूर थे, भले ही कुछ को कॅनान के प्रकार के प्रावधान से मुक्त किया जा सकता था। और यह भिक्षुओं की तुलना में महिलाओं का मामला अधिक था, भले ही अधिक ध्यान कमजोर लिंग पर दर्शाया जाना चाहिये था। इस कठिनाई ने अब से पहले कई अच्छे लोगों को नाराज कर दिया था, जिन्होंने देखा था कि जवान पुरुषों और युवतियों को महिलामठ में रहने के लिये फंेक दिया गया था। उन्होंने देखा कि क्या ही दुर्भाग्यपूर्णं परिणाम उत्पन्न हुए, क्या घोटाले हुए, और उनके विवेक पर किस तरह के जाल बिछाये गये। उन्होंने दुःख जताया कि इतने खतरनाक मामले में कॅनान के अधिकार को पूरी तरह से नफरत और नजरअंदाज किया गया था। और इन बुराईयों के अलावा, शपथों के बारे में ऐसी राय उत्पन्न हुई कि एक समय में भिक्षुओं को खुद को भी विस्थापित करना पड़ा होगा, कम से कम उन लोगों को जो थोड़ा अधिक दयालु थे। वे सिखा रहे थे कि ये शपथ बपतिस्मा के बराबर थे, वे सिखा रहे थे कि इस तरह के जीवन से उन्होंने पापों से क्षमा और परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता पा लिया था। बल्कि इससे भी अधिक, क्योंकि इससे न सिर्फ आज्ञाओं का, बल्कि सुसमाचार का भी पालन किया गया था।

इस तरह उन्होंने लोगों को समझा दिया कि मठ का पेशा बपतिस्मा की तुलना में कहीं बेहतर था, और यह कि मठवास के जीवन में, मजिस्टेªट के जीवन और पासबानों व अन्यों के जीवन से अधिक योग्य था; जो परमेश्वर की आज्ञा के मुताबिक बुलाहट में सेवकाई करती थी, जो किसी मनुष्य की बनायी सेवा के बिना थी। इनमें से किसी भी चीज को नकारा नहीं जा सकता; क्योंकि वे उनकी किताबों में दिखाई देते हैं। इसके अलावा, एक व्यक्ति जिसे इस तरह से वश में किया गया है, और जिसने मठवास में प्रवेश किया है, वह मसीह के बारे में बहुत कम सीखता है।

बाद में मठों में क्या हुआ? वे कभी पवित्र पत्रियों और अन्य अनुशासन के स्कूल हुआ करते थे जो कलीसिया के लिये उपयोगी थे। वे बिशप और पादरी का उत्पादन करते थे। अब यह एक अलग कहानी है। जो सभी को पता है कि उसका पूर्वाभ्यास करने की कोई जरुरत नहीं है। पहले वे सीखने के लिये एकत्र हुए; अब वे इस बात का दिखावा करते हैं कि दया और धार्मिकता के लिये इस तरह का जीवन शुरु किया गया था। इससे भी अधिक, वे प्रचार करते हैं कि यह सिद्धता की स्थिति है, और वे इसे जीवन के अन्य सभी दिव्य तरीकों से बहुत ऊपर रखते हैं। हमने इन बातों का उल्लेख बिना किसी घृणा और बिना अतिश्योक्ति के उल्लेख किया है, ताकि इस बिंदु पर हमारे शिक्षकों के सिद्धांत को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

सबसे पहले, जो लोग विवाह करते हैं, उनके बारे मेें हम सिखाते हैं जो लोग ब्रह्मचारी जीवन के लिये योग्य नहीं हैं, उन्हें विवाह करने की अनुमति है, क्योंकि शपथ परमेश्वर की आज्ञा को रद्द नहीं कर सकती है। परन्तु 1 कुरिन्थियों 7ः2 के अनुसार परमेश्वर की आज्ञा यह हैःः ‘‘परन्तु व्यभिचार के डर से हर एक पुरूष की पत्नी, और हर एक स्त्री का पति हो।’’ यह न केवल परमेश्वर की आज्ञा है, बल्कि यह परमेश्वर की सृष्टि और नियम है, जो उन लोगों को विवाह करने के लिये मजबूर करती है जिनसे परमेश्वर के कार्य के लिये अकेले रहकर सेवकाई की उम्मीद नहीं की जाती है। उत्पत्ति 2ः18 के अनुसार, ‘‘मनुष्य के लिये अकेला रहना अच्छा नहीं है।’’ इसीलिये परमेश्वर की आज्ञा व नियम का पालन करना कोई पाप नहीं है।

इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? उन्हें जितनी मर्जी हो उतनी शपथ पालन का गुणगान करने दें, लेकिन वे किसी भी शपथ के द्वारा परमेश्वर  की आज्ञा को रद्द नहीं कर पायेंगे। कॅनान सिखाता है कि हर शपथ में वरिष्ठ के अधिकार को स्वीकार किया जाता है, और यह कि ये शपथ पोप के खिलाफ बाध्यकारी नहीं है; इसलिये ये शपथ बहुत कम बाध्यकारी है जो परमेश्वर की आज्ञाओं के विरुद्ध है।

अब, यदि शपथ के दायित्व को किसी भी कारण से नहीं बदला जा सकता था, तो रोम के प्रधान पादरी ने कभी भी वितरण नहीं किया होता; क्योंकि मनुष्य को उस दायित्व को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है, जो पूरी रीति से ईश्वरीय है। लेकिन रोम के प्रधान पादरियों ने विवेकपूर्णं तरीके से निर्णय लिया है कि इस दायित्व में नरमी बरतना जरुरी है, और इसलिये हम पढ़ते हैं कि कई बार उन्होंने शपथ वितरण किये थे। आरागॉन के राजा का मामला, जिसे मठ से वापस बुलाया गया था, अच्छी तरह से जाना जाता है; और हमारे समय में भी उदाहरण है। इसलिये यदि लौकिक हितों को हासिल करने के लिये वितरण की मंजूरी संभव है, तो आत्माओं के संकट के कारण उन्हें मंजूरी देना अधिक उचित है।

दूसरे स्थान पर, क्यों हमारे विरोधी शपथ के प्रभाव या रीतियों के पालन को बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं, जबकि उसी समय, उनके पास शपथ की प्रकृति के बारे में कहने को कुछ भी नहीं है, यह कुछ संभव जैसी बात होनी चाहिये थी, यह स्वैच्छिक होना चाहिये था, यह इच्छापूर्वक और जानबुझकर किया जाना चाहिये था? लेकिन हर कोई जानता है कि एक आदमी किस हद तक सदाचारी होता है। और कितने ऐसे हैं जिन्होंने स्वेच्छा से और जानबुझकर शपथ लिये हैं। लड़के और लड़कियां, इससे पहले कि वे किसी बात को परख सके; उन्हें समझा-बुझाकर मना लिया गया है, कभी-कभार उन लोगों को शपथ लेने के लिये विवश भी किया गया है। इसलिये पालन करने के विषय में इतनी दृढ़ता से आग्रह करना उचित नहीं है, क्योंकि हर कोई सहमत है कि यह शपथ की प्रकृति के खिलाफ है, जिसके किसी को बिना सहमति और उचित विचार-विमर्श के लेना चाहिये।

अधिकांश धर्म-वैधानिक नियम पंद्रह वर्ष की आयु से पहले की गयी शपथों को रद्द कर देते हैं, क्योंकि उस आयु से पहले वे उतने परखने वाले प्रतीत नहीं होते हैं कि वे किसी ऐसे निर्णय ले लें, जिससे उसका बाकी जीवन प्रभावित हो जाये। एक और कॅनान, जो पुरुषों की कमजोरियों को अधिक अनुमति मंजूर करता है, कुछ अधिक वर्ष जोड़ देता है; क्योंकि अठारह साल से पहले कोई शपथ लेने की मनाही करता है। परन्तु हमें इन दो कॅनानों में से किसका पालन करना चाहिये? एक बड़ी बहुमत ने मठवास का त्याग करने के लिये माफी चाहा है, क्योंकि उनमें से अधिकांश ने इस उम्र तक पहुंचने से पहले शपथ लिये थे।

अंत में, यहां तक कि ऐसे मामलों में भी, जब शपथ को तोड़ने वालों को फटकार लगाया जा सकता था, फिर भी सीधे-सीधे ऐसा नहीं लगता था कि ऐसे लोगों के विवाह को भंग किया जाना चाहिये। क्योंकि ऑगस्टीन इस बात से इन्कार करते हैं कि उन्हें विवाह भंग कर देना चाहिये, जिनके अधिकार में कुछ वजन हैं, भले ही अन्य लोग बाद में अलग तरीके से सोचते हों।

लेकिन यद्यपि विवाह के विषय में परमेश्वर  की आज्ञा अधिकांश लोगों को उनके शपथ से मुक्ति दिलाती है, फिर भी हमारे शिक्षक शपथ से संबंधित यह दिखाने के लिये एक और तर्क देते हैं कि वे शून्य हैं। क्योंकि परमेश्वर की प्रत्येक सेवा के लिये, जो अनुग्रह और धार्मिकता पाने के लिये बिना परमेश्वर की आज्ञा के चुने और ठहराये हुए हैं, वे दूष्ट लोग हैं, जैसे कि यीशु ने मत्ती 15ः9 मंे कहा हैः ‘‘ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्य की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।’’ और पौलुस हर जगह सिखाता है कि धार्मिकता की प्राप्ति उपासना की विधि और पालन से नहीं होती है, जो लोगों की चतुराई है, परन्तु यह कि यह विश्वास करने वालों को प्राप्त होता है जो मानते हैं कि वे मसीह के अनुग्रह से परमेश्वर के द्वारा अपनाये गये हैं।

भिक्षुओं ने स्पष्ट रुप से सिखाया कि मनुष्य की बनायी रीतियों का पालन करने से पापों की तुष्टिकरण होती है, और इससे अनुग्रह व धार्मिकता की प्राप्ति होती है। निश्चित रुप से यह केवल मसीह की महिमा से अलग करती है, और विश्वास की धार्मिकता का इन्कार और अस्पष्ट करती है। यह आगे कहती है कि इसीलिये ये शपथ अधर्मी आराधना के रुप से बहुत ही सामान्य थे, और इसी कारण से वे शून्य हैं। एक दूष्ट के लिये परमेश्वर की आज्ञा के विरुद्ध ली गयी शपथ मान्य नहीं है; क्योंकि किसी भी शपथ को अधर्म के बंधन में नहीं रहना चाहिये, जैसे कि कॅनान कहता है।

गलातियों 5ः4 में पौलुस कहता हैः ‘‘तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग और अनुग्रह से गिर गए हो।’’ इसलिये, उन लोगों के लिये भी, जो अपनी शपथों से धर्मी ठहरना चाहते हैं, मसीह का कोई प्रभाव नहीं है और वे अनुग्रह से वंचित हो चुके हैं। क्योंकि वे, जो अपनी शपथ में धार्मिकताओं में योगदान देते हैं, वे अपने कर्म मंे ऐसे योगदान देते हैं मानो वह ठीक-ठीक मसीह की महिमा के लिये है।

वास्तव में, कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि भिक्षुओं ने ऐसी शिक्षा दी है कि वे अपनी शपथ व पालन से धर्मी ठहराये गये हैं, और अपने पापों की क्षमा पाये हैं। इससे भी परे, उन्होंने और भी हास्यास्पद दावों का आविष्कार किये, और कहे कि वे अपने कर्मों को दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं। यदि हम इसके विज्ञापन के बारे में तर्क करना चाहते, और इन बातों का विस्तार करते, तो हम कई और चीजों को इकट्ठा कर सकते थे, जिससे भिक्षुओं को भी शर्म आ जाती। इससे भी परे और अधिक, उन्होंने लोगों को समझा दिया कि लोगों के द्वारा तैयार किये गये संस्कार मसीही सिद्धता की एक दशा थी। क्या यह कर्मों में धार्मिकता को नहीं जोड़ रही है? यह कलीसिया में एक छोटा घोटाला नहीं है; वे परमेश्वर की आज्ञा के बिना, मनुष्य की चतुराई से लोगों को सेवा देते हैं, और सिखाते हैं कि इस प्रकार के सेवा लोगों को धर्मी ठहराती है। क्योंकि कलीसिया में किसी और बात से बढ़कर विश्वास की धार्मिकता के बारे में सिखाया जाना चाहिये। परन्तु यह अस्पष्ट हो जाता है, जब आराधना के स्वर्गदूतीय रुप, दरिद्रता, विनम्रता और ब्रह्मचर्य का दिखावा लोगों की आंखों के सामने प्रस्तुत किया जाता है।

इसके अलावा, परमेश्वर  के उपदेश और परमेश्वर  की सच्ची सेवा अस्पष्ट हो जाती है, जब लोग सुनते हैं कि केवल भिक्षु लोग ही सिद्धता की स्थिति में है। मसीही सिद्धता मन से परमेश्वर का भय मानने से होता है, और तौभी बड़ा विश्वास रखना है और भरोसा करना है कि मसीह में हमारा एक ऐसा परमेश्वर  है जिसके साथ हमारा मेल हो चुका है; फिर उस परमेश्वर से मांगना, और निश्चित रुप से हमारे उन कामों में मदद पाने की उम्मीद रखना जिन्हें हमारी बुलाहट के अनुसार करने की जरुरत है; और इस बीच, बाहर के अच्छे कार्यों में मेहनती होना और अपनी बुलाहट के अनुसार काम करना है। परमेश्वर  की सच्ची सिद्धता और सच्ची सेवा इन्हीं बातों में निहित है। यह ब्रह्मचर्य, या भीख मांगने, या नीच वस्त्ऱों में शामिल नहीं है। लेकिन लोग मठवासी जीवन की झूठी प्रशंसाओं से कई खतरनाक राय लेते हैं। वे ब्रह्मचर्य की बेपरिमाण तारीफ की बात सुनते हैं; इसलिये वे अपने विवेक के विरुद्ध अपने विवाहित जीवन को चलाते हैं। वे सुनते हैं कि केवल भिक्षुक ही सिद्ध हैं, इसलिये वे अपनी संपत्ति रखते हैं और अपने विवेक से घिनौना व्यवसाय करते हैं। वे सुनते हैं कि यह एक सुसमाचारीय सलाह है कि बदला नहीं लेना चाहिये; इसलिये कुछ लोग अपने नीजी जीवन में बदला लेने से नहीं डरते हैं, क्योंकि वे सुनते हैं कि यह एक सलाह है, न कि आज्ञा। दूसरे लोग सोचते हैं कि मसीही लोगों की पकड़ नागरिक कार्यालयों में या मजिस्टेªेट होने के लिये नहीं है।

उदाहरणस्वरुप ऐसे लोगों का उदाहरण है जिन्होंने राष्ट्रमंडल के प्रशासन और विवाह को त्याग दिये और खुद को मठवासियों के बीच छुपा लिये। उन्होंने कहा कि यह ‘‘दुनिया से पलायन’’ और ‘‘ऐसे जीवन की खोज है जो परमेश्वर को और अधिक प्रसन्न करने वाली होगी’’। लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि उन्हें उन आज्ञाओं का पालन करते हुए परमेश्वर की सेवा करनी चाहिये थी, न कि मनुष्य की चतुराई से बनी आज्ञाओं से। एक अच्छा व सिद्ध जीवन वह है जिसमें परमेश्वर की आज्ञा पायी जाती है। यह जरुरी है कि लोगों को इन चीजों के बारे में चितौनी दी जाये।

यहां तक कि इन समयों से पहले भी, गेर्सन ने सिद्धता के विषय में भिक्षुओं की इस त्रुटि का खंडन किया, और उन्होंने गवाही दी कि उनके अपने दिनों में यह एक नई कहावत थी कि मठवासी का जीवन एक सिद्ध स्थिति है।

ये शपथ इतनी दुष्ट विचारों से जुड़ी हुई हैं जिसे वे धर्मी ठहरते हैं, जिससे वे मसीही सिद्धता स्थापित करते हैं, जिससे वे सलाह व आज्ञाओं का पालन करते हैं, जिससे वे अपने कर्तव्यों से भी बढ़कर काम करने की इच्छा रखते हैं। चूंकि ये सभी बातें झूठे और खाली दावे हैं, जो उनके शपथों को शून्य और निर्रथक बना देते हैं।

अनुच्छेद अठाईस – कलीसियाई अधिकार के बिषय में

बिशपों के अधिकार के बारे में बड़े मतभेद रहे हैं। इनमें से कुछ ने अनुचित रुप से कलीसिया की शक्ति को तलवार की ताकत में मिलाया है। और इस भ्रम के परिणाम में बड़े युद्ध और दंगे हुए। इस बीच, धार्मिक अगुवे कंुंजी बातों पर निर्भर होते हुये न केवल नये संस्कारों की स्थापना की और मामलों और आरक्षणों के निर्मूलन के साथ विवेक को बोझिल किये, बल्कि इस दुनिया के राज्यों को स्थानांतरित करने और सम्राट से साम्राज्य को लेने की भी कोशिश की। अच्छी तरह से शिक्षित और धर्मी लोगों ने लंबे से कलीसिया में इन गलतियों के कारण फटकार लगाते रहे। इसलिये हमारे शिक्षकों ने लोगों की सांत्वना के लिये कलीसिया और तलवार के बीच ताकत के अन्तर को दिखाने के लिये विवश हो गये। और हमने सिखाया कि हमें एक-दूसरे का आदर-सम्मान करना चाहिये, जो परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार है, मानो कि वे इस पृथ्वी पर परमेश्वर की सबसे बड़ी आशीष है।

हालाँकि यह हमारी राय हैः कि सुसमाचार के अनुसार, कुंजियों की शक्ति और बिशपों की शक्ति परमेश्वर की आज्ञा या शक्ति है, जो सुसमाचार प्रचार करने के लिये है, पापों को दूर करने या बनाये रखने के लिये है, और पवित्र विधियों की सेवकाई के लिये है। क्योंकि इस आज्ञा के अनुसार यीशु अपने शिष्यों को भेजते हैं, जैसे कि यूहन्ना 20ः21-23 में लिखा हैः ‘‘ जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूं। यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा, पवित्रा आत्मा लो। जिन के पाप तुम क्षमा करो वे उन के लिये क्षमा किए गए हैं जिन के तुम रखो, वे रखे गए हैं।’’ और फिर मरकुस 16ः15 में कहता हैः ‘‘तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।’

मनुष्य इस अधिकार का प्रयोग केवल सुसमाचार की बातें सिखाने, प्रचार करने और पवित्र-विधियों की सेवकाई या तो कई लोगों की, या किसी व्यक्ति विशेष की सेवकाई के लिये करते हैं, जो उनके बुलाहट के अनुसार है। इसके लिये वे शारीरिक रुप से नहीं, बल्कि शाश्वत चीजों जैसे कि पवित्र आत्मा और अनन्त जीवन पर निर्भर होते हैं। वचन और पवित्र विधियों की सेवकाई के बिना कोई भी इन चीजों को प्राप्त नहीं कर सकता है, जैसे कि पौलुस रोमियों 1ः16 में कहता हैः ‘‘क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिये कि वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिये उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ है।’’ इसलिये, कलीसिया की शक्ति शाश्वत चीजों को अनुदान देती है, और यह केवल वचन के सेवकाई से ही होती है, और यह नागरिक सरकार में हस्तक्षेप नहीं करती है; गायन की कला से अधिक कोई नागरिक सरकार में हस्तक्षेप नहीं करता है। क्योंकि नागरिक सरकार और सुसमाचार अलग-अलग चीजों से निपटते हैं। नागरिक नियम मन की नहीं परन्तु शरीर की रक्षा करते हैं, और शारीरिक चीजें प्रकट घावों की; और वे मनुष्य को तलवार और शारीरिक दण्डों से बचाते हैं ताकि नागरिक न्याय और शांति बनी रहे।

इसलिये हमें कलीसिया और राज्य की शक्तियों का मिश्रण नहीं करना चाहिये। सुसमाचार की शिक्षा देने और पवित्र विधियों की सेवकाई के लिये कलीसिया की शक्ति का अपना जनादेश है। इसे दूसरे कार्यालय में न जाने दें, इसे इस दुनिया के राज्यों में स्थानांतरित न होने दें, इसे मजिस्ट्रेट के कानूनों को निरस्त न करने दें; इसे कानूनी आज्ञाकारिता को खत्म करने न दें; इसे सिविल नागरिक अध्यादेशों या अनुबंधों से संबंधित निर्णयों में हस्तक्षेप करने न दें; और इसे राष्ट्रमंडल के रुप के विषय में मजिस्ट्रेटों को कानून न बताने दें। जैसे कि यूहन्ना 18ः36 में यीशु कहता हैः ‘‘परन्तु अब मेरा राज्य यहां का नहीं।’’ और लूका 12ः14 मेंः ‘‘किस ने मुझे तुम्हारा न्यायी या बांटनेवाला नियुक्त किया है?’’ पौलुस भी फिलिप्पियों 3ः20 में कहता हैः ‘‘पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है।’’ और 2 कुरिन्थियों 10ः4 मेंः ‘‘क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।’’

इस तरह हमारे शिक्षक प्रत्येक शक्ति के कर्तव्यों के बीच अंतर करते हैं, और हमें एक वरदान के रुप में सम्मानित करने और प्रत्येक को परमेश्वर की आशीष के रुप में पहचानने की आज्ञा देते हैं।

यदि किन्हीं भी बिशपों के पास तलवार की शक्ति है, तो उनकी शक्ति सुसमाचार के अध्यादेश से नहीं, परन्तु मनुष्य के अधिकार से है; जिसे उन्होंने अपनी भलाई के लिये राजाओं और सम्राटों से प्राप्त किये हैं। तौभी, यह एक ऐसा कार्य है जो सुसमाचार की सेवकाई से अलग है।

इसलिये, जब हम बिशप के अधिकार क्षेत्र से संबंधित प्रश्न पर विचार करते हैं, तो हमें नागरिक प्राधिकरण को कलीसियाई प्राधिकरण से अलग करना चाहिये। फिर, सुसमाचार के अनुसार, या ‘‘ईश्वरीय अधिकार के द्वारा’’ जैसे कि वे कहते हैं, कोई भी अधिकार क्षेत्र बिशपों के रुप में बिशपों के लिये नहीं होता है, जो कि, एक मनुष्य होने के नाते, उसको वचन और पवित्र-विधि की सेवकाई का भार सौंपा गया है, बजाय पापों को क्षमा करने; और उसी तरह सिद्धांतों को आंकने, और उस शिक्षा को अस्वीकार करने के लिये जो सुसमाचार के विपरीत है; और उन दूष्ट लोगों को कलीसिया की संगति से बाहर निकालने के लिये जिनकी दूष्टता जाहिर है, और यह सब मानवीय शक्ति के द्वारा नहीं, परन्तु परमेश्वर के वचन से किया जाना है। इन्हें कलीसियाओं को आवश्यक रुप से और ईश्वरीय अधिकार के कारण पालन किया जाना चाहिये। लूका 10ः16 के अनुसार, ‘‘जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है।’’ लेकिन जब वे सुसमाचार के खिलाफ कुछ भी सिखाते या सुनाते हैं, तो मंडली को परमेश्वर की ओर से एक आज्ञा मिलती है, जो उनकी बातों को मानने से मना करती है। मत्ती 7ः15 में, ‘‘झूठे नबियों से सावधान रहो।’’ और गलातियों 1ः8 में ‘‘परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो।’’ और 2 कुरिन्थियों 13ः8,10 मेंः ‘‘क्योंकि हम सत्य के विरोध में कुछ नहीं कर सकते, पर सत्य के लिये कर सकते हैं।’’ और ‘‘इस कारण मैं तुम्हारे पीठ पीछे ये बातें लिखता हूं, कि उपस्थित होकर मुझे उस अधिकार के अनुसार जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है।’’ ऐसा ही कैनोनिकल लॉज़ कमांड ;प्प्ण्फनमेजपवदण् टप्प्ण् ब्ींचजमतए ैंबमतकवजमेए ंदक ब्ींचजमतए व्अमेद्ध और ऑगस्टीन ;ब्वदजतं च्मजपसपंदप म्चपेजवसंउद्ध  लिखते हैंः ‘‘हमें कैथोलिक बिशप के अधीन कदाचित् नहीं होना चाहिये यदि वे गलत हैं, या परमेश्वर के वचन के विपरीत किसी बात को पकड़े हुए हैं।’’

यदि उनके पास कुछ मामलों की सुनवाई और न्याय करने में कोई अन्य शक्ति या अधिकार क्षेत्र है, जैसे कि विवाह, दशमांश और इस तरह के अन्य मुद्दे, तो यह उनके पास मानवीय अधिकार के तहत है। ऐसे मामलों में, जब साधारण लोग विफल हो जाते हैं, तो राजकुमार बाध्य होते हैं, यहां तक कि उनकी इच्छा के विरुद्ध वे फैसला करते हैं और शांति बनाये रखते हैं।

इसके अलावा, यह विवादित है कि बिशप या पादरी को कलीसिया में समारोहों को पेश करने, और भोजन, पवित्र-दिवस, और सेवकों के पद या क्रम जैसे नियमों को ठहराने का अधिकार है, अथवा नहीं। जो लोग दावा करते हैं कि बिशपों को यह अधिकार है, वे यूहन्ना 16ः12-13 के वचन का उल्लेख करते हैंः ‘‘मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।’’ वे प्रेरितों के काम 15ः20 के उदाहरण को भी पेश करते हैं जहां गला घोंटे हुओं के मांस से और लोहू से परे रहने की बात कही गयी है। वे सब्त के दिन का उल्लेख करते हैं जिसको प्रभु का दिन में बदल दिया गया था, जो दस आज्ञा के विपरीत प्रतीत होता है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि वे सब्त के दिन को बदलने से ज्यादा उद्धृत करते थे। वे कहते थे, कलीसिया की शक्ति बहुत बड़ी है, क्योंकि यह दस आज्ञाओं में से एक के साथ अलग हुई है।

लेकिन इस सवाल पर हमारे लोग सिखाते हैं कि बिशपों के पास सुसमाचार के खिलाफ कुछ भी तय करने की शक्ति नहीं है, जैसा कि हमने ऊपर दिखाया है। कॅनान के नियम भी यही बात सिखाती है। इसके अलावा, यह पवित्रशास्त्र के खिलाफ है कि हम परंपराओं का पालन करें, पापों की तुष्टि करें, या अनुग्रह और धार्मिकता प्राप्त करें। क्योंकि जब हम परंपराओं की ऐसी पालन से धार्मिकता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं तो हम मसीह की महिमा प्राप्त करने से भटक जाते हैं। तौभी, स्पष्ट रुप से, इस राय के कारण, कलीसिया की परंपराएं लगभग असीम रुप से कई गुणा बढ़ गयी है; जबकि उसी समय, विश्वास और धार्मिकता की शिक्षा को दबा दिया गया है। इसीलिये उन्होंने अधिक पर्व और त्योहार ठहराये, उपवास के दिन निर्धारित किये, संतों को सम्मान देने के लिये नये समारोहों और सेवाओं की स्थापना की; क्योंकि इन परंपराओं के लेखकों ने सोचा था कि इन कर्मों से वे अनुग्रह प्राप्त कर लेंगे। इस तरह, बीते समय में, प्रायश्चित से संबंधित कॅनान कई गुणा बढ़ गये; और हम अभी भी तुष्टिकरणों में इसके निशान देख सकते हैं।

इसी तरह, परंपराओं के लेखकों ने परमेश्वर की आज्ञा का विरोध किये; जब वे भोजन, दिनों, और ऐसी चीजों के लिये पापों की खोज किये, और फिर व्यवस्था के गुलाम के रुप में कलीसिया में बोझ डाल दिये; मानो कि परमेश्वर ने प्रेरितों और बिशपों को लेवियों की सेवकाई की तरह कुछ नियम ठहराने की आज्ञा दी हो, जिससे मसीही लोग धार्मिकता प्राप्त कर सके। और कुछ हद तक कलीसिया के प्रधान पुरोहितगणों को भी मूसा की व्यवस्था के उदाहरण से गुमराह किया गया थां। यहीं से वे बोझ आये थेः कि यह एक नश्वर पाप है जो यहां तक कि दूसरों के विरुद्ध किये बिना है, कि पवित्र-दिनों में हाथों से काम करे; कि कॅनान के घण्टे को पालन न करना एक नश्वर पाप है; कि कुछ भोजन विवेक को अशुद्ध करती है; कि उपवास ऐसे कार्य है जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है; कि एक आरक्षित मामले में उस पाप को उसके बिना कभी क्षमा नहीं किया जा सकता जिसके पास इसके आरक्षण का अधिकार हो। यद्यपि कॅनान स्वयं अपराध को आरक्षित करने की बात नहीं कहता, परन्तु कलीसियाई दण्ड को आरक्षित के बारे में कहता है।

बिशपों को लोगों के विवेक को अपने जाल में फंसाने के लिये कलीसिया पर इन परंपराओं को रखने का अधिकार कहां से आता है, जबकि प्रेरितों के काम 15ः10 में पतरस शिष्यों के गर्दन पर जुआ रखने से मना करता है; और 2 कुरिन्थियों 13ः10 में पौलुस कहता है कि प्रभु ने उसको बिगाड़ने के लिये नहीं परन्तु बनाने के लिये सामर्थ दिया है। क्यों? इसीलिये, क्या वे इन परंपराओं से पापों को बढ़ावा देते हैं?

लेकिन स्पष्ट प्रमाण है जो ऐसी परंपराओं को बनाने से रोकते हैं, जैसे कि वे अनुग्रह पाने या उद्धार के लिये जरुरी है। कुलुस्सियों 2ः16, 20-23 में पौलुस कहता हैः ‘‘इसलिये खाने पीने या पर्ब्ब या नए चान्द, या सब्तों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे। जब कि तुम मसीह के साथ संसार की आदि शिक्षा की ओर से मर गए हो, तो फिर उन के समान जो संसार में जीवन बिताते हैं मनुष्यों की आज्ञाओं और शिक्षानुसार और ऐसी विधियों के वश में क्यों रहते हो? कि यह न छूना, उसे न चखना, और उसे हाथ न लगाना। (क्योंकि ये सब वस्तु काम में लाते लाते नाश हो जाएंगी)। इन विधियों में अपनी इच्छा के अनुसार गढ़ी हुई भक्ति की रीति, और दीनता, और शारीरिक योगाभ्यास के भाव से ज्ञान का नाम तो है, परन्तु शारीरिक लालसाओं को रोकने में इन के कुछ भी लाभ नहीं होता।’’ तीतुस 1ः14 में भी खुले आम परंपराओं को पालन करने की मनाही की गयी हैः ‘‘और वे यहूदियों की कथा कहानियों और उन मनुष्यों की आज्ञाओं पर मन न लगाएं, जो सत्य से भटक जाते हैं।’’

और मसीह भी मत्ती 15ः14,13 में उन लोगों के बारे में कहता है जो परंपराओं का पालन करते हैंः ‘‘उन्हें अकेला छोड़ दो क्योंकि वे अंधों के अंधे अगुवे हैं।’’ और वह ऐसी आराधना का तिरस्कार करता हैः ‘‘हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा।’’

यदि बिशपों को अनंत परंपराओं के साथ कलीसियाों पर बोझ डालने और विवेक को अपने जाल में फंसाने का अधिकार है, तो फिर क्यों पवित्रशास्त्र अक्सर परंपराओं को बनाने और सुनने पर प्रतिबंध लगाता है? तो 1 तीमुथियुस 4ः1 में, क्यों इसे ‘‘दुष्टात्माओं का सिद्धांत’’ कहा गया है? क्या पवित्र आत्मा ने हमें इन चीजों के बारे में अग्रिम चेतावनी दी है?

इसलिये, चूंकि ये प्रथा सुसमाचार के विरोध में है, क्योंकि वे ऐसे ठहराये गये हैं मानों कि वे अत्यावश्यक हैं, या उसमें यह विचार समाहित किया गया है कि उनसे अनुग्रह की प्राप्ति होती है, इनका पालन ऐसे किया जाता है कि बिशपों को ऐसी इन परंपराओं में सेवा प्रदान करने की अनुमति नहीं है। इसके लिये जरुरी है कि कलीसियाों में मसीही स्वतंत्रता के सिद्धांत की रक्षा की जाए, अर्थात् व्यवस्था को बंधन धर्मी ठहराये जाने के लिये आवश्यक नहीं है, जैसे कि गलातियों 5ः1 में लिखा हैः ‘‘और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो।’’ यह जरुरी है कि सुसमाचार के मूख्य अनुच्छेछ को संरक्षित किया जाये, अर्थात् यह कि हम मसीह में विश्वास करने से बिना किसी दाम के अनुग्रह पाते हैं, और न कि मनुष्य के चतुराई से बनायी गयी आराधना के नियम के पालन करने से।

तो फिर, क्या हमें प्रभु के दिन और प्रभु के घर में उसी तरह के रीतियों के बारे में सोचना चाहिये? इस प्रश्न के लिये हम उत्तर देते हैं कि यह बिशप या पादरी के लिये अध्यादेश बनाने के लिये वैध है, ताकि कलीसिया में चीजों को व्यवस्थित तरीके से किया जाये, न कि उसके द्वारा हमारे पापों की तुष्टिकरण या फिर अनुग्रह पाने के लिये, या फिर उन्हें जरुरी सेवाएं समझते हुए हमारे विवेक को अंधा करने के लिये; और यह सोचें कि दूसरों के प्रति पाप किये बिना यह पाप है। इसलिये पौलुस 1 कुरिन्थियों 11ः5 में यह तय करता है कि कलीसिया में स्त्रियों को अपने सिर ढंकना चाहिये, और फिर 1 कुरिन्थियों 14ः30 में वह कहता है कि अनुवादकों को क्रम से बोलने दिया जाना चाहिये ताकि कलीसिया सुन सके, और इसके जैसे कई और बातें।

यह उचित है कि कलीसिया को प्रेम और शांति के लिये इस तरह के अध्यादेशों का पालन करना चाहिये, ताकि एक व्यक्ति दूसरे को अपमानित न करे, ताकि कलीसियाों में सभी चीजें क्रम से और बिना भ्रम के हों (1 कुरिन्थियों 14ः40 और फिलिप्पियों को तुलना करें)। लेकिन यह इस तरह किया जाना चाहिये ताकि यह सोचने के लिये विवेक पर बोझ न पड़े कि ये चीजें उद्धार के लिये हैं, या यह न्याय करने के लिये कि वे पाप करते हैं जब वे दूसरों के प्रति अपराध के बिना इसे तोड़ते हैं। इस प्रकार किसी को यह नहीं कहना चाहिये कि यदि कोई स्त्री बिना सिर ढंके लोगों के बीच जाती है तो वह पाप करती है, जबकि वह किसी को परेशान नहीं करती है।

प्रभु का दिन, ईस्टर, पिन्तेकुस्त, और सभी पवित्र दिनों और संस्कारों का पालन इसी श्रेणी में आता है। वे लोग बहुत गलत समझ रहे हैं जो सोचते हैं कि कलीसिया के अधिकार ने सब्त के दिन के स्थान पर प्रभु के दिन का पालन करना आवश्यक बना दिया है। पवित्रशास्त्र ने सब्त के दिन को निरस्त कर दिया है, क्योंकि यह सिखाता है कि जब से सुसमाचार प्रकट हुआ है, मूसा के सभी विधियों को मिटा दिया गया है। और तौभी, क्योंकि एक निश्चित दिन को निश्चित करना आवश्यक था, ताकि लोग जान सकें कि उन्हें कब एक साथ इकट्ठा होना चाहिये। ऐसा प्रतीत होता है कि कलीसिया ने इसी उद्देश्य से प्रभु के दिन को ठहराया है। और ऐसा जान पड़ता है कि इस दिन को हर अतिरिक्त कारणों से भी चुना गया है, ताकि लोगों में मसीही स्वतंत्रता का नमूना हो, और वे जान सकें कि सब्त या किसी अन्य दिन का पालन करना जरुरी नहीं है।

व्यवस्था, नयी व्यवस्था के संस्कारों और सब्त के दिन में बदलाव के बारे में कुछ भयानक तर्क दिये जा रहे हैं, जो झूठे विश्वास से उछाले जा रहे हैं कि कलीसिया में कुछ लेवीय सेवकाई की तरह होने की जरुरत है, और यह कि मसीह ने प्रेरितों और बिशपों को यह आदेश दिया है कि उद्धार की जरुरत के लिये नये संस्कारों को तैयार करे। इन त्रुटियों ने कलीसिया में पकड़ बना लिया क्योंकि विश्वास की धार्मिकता के बारे में स्पष्ट और पर्याप्त शिक्षा नहीं दी गयी। कुछ लोग तर्क देते हैं कि प्रभु के दिन को पालन करना ईश्वरीय अधिकार के तहत स्थापित नहीं की गयी थी, तौभी ऐसा लगता है कि यह ईश्वरीय अधिकार से है। वे पवित्र-दिनों के बारे में बताते हैं कि यह काम करने के लिये कितना सही है। इस तरह के तर्क अंतरात्मा के अलावा क्या है? क्योंकि यद्यपि वे परंपराओं को सही ठहराने की कोशिश कर सकते हैं, तौभी उनके द्वारा सही ठहराया जाना स्पष्ट नहीं होगा, जब तक यह राय बनी रहेगी कि वे जरुरी हैं; परन्तु वहां ये राय आवश्यक रुप से बनी रहेंगी जहां विश्वास की धार्मिकता और मसीही स्वतंत्रता ज्ञात  नहीं है।

प्रेरितों के काम 15ः20 में प्रेरितों ने आज्ञा दियेः ‘‘लोहू से परे रहें।’’ अब उसका पालन कौन करता है? और तौभी वे लोग पाप नहीं कर रहे हैं जो इसका पालन नहीं करते, क्योंकि यहां तक कि प्रेरितगण स्वयं इस प्रकार के बंधन से किसी के विवेक को बांधना नहीं चाहते थे; परन्तु ऐसे अपराध से बचने के लिये उन्होंने केवल एक बार मना किये थे। सुसमाचार के सुसंगत उद्देश्य के लिये इसे अध्यादेश का एक भाग माना चाहिये।

शायद ही किसी भी कॅनान को बहुत सटीक रुप से रखा जाता है, और उन में से कई हर दिन चलन से बाहर हो जाते हैं, यहां तक कि उन लोगों के बीच भी जो परंपराओं की सावधानीपूर्वक रक्षा करते हैं। और लोगों की अंतरात्मा को सांत्वना देना भी संभव नहीं है जब तक कि यह न्याय पालन किया जाए कि हम जानते हैं कि जो जरुरी है उस कॅनान को बिना राय के रखा जाता है।

हालांकि, बिशप आसानी से लोगों की कानूनन आज्ञाकारिता को बनाये रख सकते हैं, अगर वे इस बात पर जोर नहीं देंगे कि वे उन परंपराओं का पालन करते हैं जिसे भले विवेक से पालन नहीं किया जा सकता है। अब वे ब्रह्मचर्य की आज्ञा देते हैं। वे केवल उन लोगों के सामने मानते हैं जो शपथ खाते हैं कि वे सुसमाचार के शुद्ध को नहीं सिखायेंगे। कलीसिया बिशप को अपने सम्मान की कीमत पर सहमति बहाल करने के लिये नहीं कह रहे हैं, जो फिर भी उन पादरियों के द्वारा ऐसा करने से अच्छा होगा। वे केवल यही मांगते हैं कि वे अन्यायपूर्णं बोझ से मुक्त कर देंगे, जो नयी है और जो कैथॉलिक कलीसिया की परंपरा के विपरीत है। यह हो सकता है कि शुरुआत में, इन में से कुछ अध्यादेशों के लिये, प्रशंसनीय कारण थे, जो बाद के समय के लिये उपयुक्त नहीं हैं। यह भी स्पष्ट है कि कुछ अध्यादेश गलत तरीके से अपनाये गये थे। इसलिये अब उनको कम करने के लिये मुख्य पादरियों के दयाशीलता में आ जाता है, क्योंकि इस तरह के संशोधन कलीसिया की एकता को हिलाती नहीं है। क्योंकि अनेक मानवीय परंपराएं समय के क्रम में बदली है, जैसे कि स्वयं कॅनान दिखाता है। लेकिन अगर इस तरह के पालनों के लिये दया प्राप्त करना असंभव है जिसे पाप के बिना पालन नहीं किया जा सकता है, तो हम प्रेरितों के नियम को पालन करने के लिये बाध्य हैं (प्रेरितों के काम 5ः29); जो हमें मनुष्य से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा पालन करने की आज्ञा  देता है।

1 पतरस 5ः3 में, पतरस बिशपों को प्रभु होने और कलीसियायों पर शासन करने से मना करता है। अब हमारा यह इरादा नहीं है कि सरकार को बिशपों से बचायें, लेकिन हम एक बात पुछते हैं, कि क्या वे सुसमाचार को शुद्धता से सिखाने की अनुमति देते हैं? और क्या उन पालनांे से आराम देते हैं जिन्हें बिना पाप के पालन नहीं किया जा सकता है? लेकिन अगर वे कोई रियायत नहीं देते हैं तो यह उनके लिये है कि वे किस प्रकार अपनी जिद से और फूट के कारण परमेश्वर  को लेखा देंगे।

अन्त में,

ये ही वो अनुच्छेद हैं जो विवादास्पद प्रतीत होता है। हालांकि हम और अधिक त्रुटियों की बात कर सकते थे, फिर भी अनुचित लंबाई से बचने के लिये, हमने मुख्य बिंदुओं को निर्धारित किया है, जहां से बाकी को आसानी से आंका जा सकता है। भोग-विलास, तीर्थ और निर्वासन के दुरुपयोग से संबंधित बड़ी शिकायतें मिली हैं। पैरिश के पादरी लोग इन बंटवारे में संलिप्त लोगों के कारण कई तरह से परेशान रहे थे। पादरियों और भिक्षुओं के बीच अंतहीन विवाद थे। पादरियों और भिक्षुओं के बीच असाधारण अवसरों, पाप-स्वीकार, अंत्येष्टि, असाधारण अवसरों पर धर्मोपदेश और अनगिनत चीजों से संबंधित कलह थे। हमने इस तरह के मुद्दों को पारित कर दिया है, ताकि इस मामले में मुख्य बिंदुओं को, जिसे संक्षिप्त रुप से निर्धारित किया जा चुका है, और अधिक आसानी से समझा सके। न तो यहां किसी और बात को कहा गया है, और न ही फटकार लगायी गयी है। केवल उन्हीं बातों का वर्णन किया गया है जिसके बारे में हमें बोलना जरुरी था ताकि यह समझा जा सके कि सिद्धांतों और धार्मिक रीतियों के बारे में पवित्रशास्त्र और कैथोलिक कलीसिया के खिलाफ हमारी ओर से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। क्योंकि यह प्रकट है कि हमने बहुत बुद्धिमानी से ख्याल रखा है कि कोई नयी और विधर्मी सिद्धांत हमारे कलीसियायों में अपना जड़ न पकड़े।

हम आपकी महामहिम फरमान के अनुसार उपरोक्त अनुच्छेद प्रस्तुत करने की इच्छा रखते हैं, ताकि हमारा अंगीकार को प्रदर्शित किया जा सके, और लोगों को हमारे शिक्षकों के सिद्धांत का सारांश देखने दिया जा सके। अगर ऐसा कुछ भी है जो किसी को लगता है कि इस अंगीकार में अभी भी गायब है, तो हम तैयार हैं कि परमेश्वर की इच्छा में होकर पवित्रशास्त्र के अनुसार पूरी जानकारी प्रस्तुत कर सकें।

आपके शाही महामहिम के विश्वासयोग्यः

जॉन, ड्युक ऑफ सैक्सोनी, इलेक्टर

जॉर्ज, मार्ग्रेव ऑफ बैंडेनबर्ग

अर्नेस्ट, ड्यूक ऑफ ल्युएनबर्ग

फिलिप, हेस्से ऑफ लैंडग्रेव

जॉन फ्रेडरिक, ड्यूक ऑफ सैक्सोनी

फ्रांसिस, ड्यूक ऑफ ल्युएनबर्ग

वोल्फगैंग, प्रिंस ऑफ एैंहाल्ट

सीनेट एंड मैजिस्ट्रेसी ऑफ न्यूरेम्बर्ग

सीनेट ऑफ रीटलिंगन